Saturday, 10 January 2015

धर्मातरण और धर्म स्वतंत्र्य अधिनियम #osho

भारतीय संसद जो न करे थोडा है बुढ़े बच्चों की जमात है शरीर से तो बूढ़े है बुद्धि से बहुत बचकाने जिस विधायक को धर्म स्वातंत्र्य विधेयाक नाम दिया जा रहा वह वस्तुतः धार्मिक परंतत्रता लाने का विधेयक है उसका नाम ही झूठा है नाम उल्टा है


इस विधेयक के द्वरा इस बात की चेष्टा की जा रही की लोग धर्म परिवर्तन न कर सके कोई हिन्दू ईसाई न हो सके कोई मुसलमान न हो सके कोई मुसलमान हिन्दू न हो सके मुसलमान हिन्दू होते भी नहीं ईसाई हिन्दू होते भी नहीं इसलिए विधेयक वस्तुतः ईसाई धर्म के खिलाफ है क्योकि हिन्दू ईसाई होते है


और किसी व्यक्ति की धर्म को चुनने की स्वतंत्रता को छीनने स्वतन्त्रता विधेयक कहना अत्यंत मूढ़तापूर्ण है अगर कोई ईसाई होना चाहता है तो वो हक़दार है ईसाई होने का सच तो यह है जन्म के साथ धर्म का कोई संबंध नहीं है नहीं तो आज नहीं तो कल भारतीय संसद को एक और विधेयक ले आना चाहिए फ्रीडम ऑफ पॉलिटिकल आइडियालजी बिल राजनैतिक विचारधारा का स्वतन्त्रता का विधेयक की जो कम्युनिस्ट के घर पैदा हुआ है वो कम्युनिस्ट ही रहना पड़ेगा और जो कांग्रेसी के घर पैदा होगा वो उसे कांग्रेसी ही रहना पड़ेगा अगर जन्म के साथ राजनीती तय नहीं होती तो जन्म के साथ धर्म की विचारधारा कैसे तय हो सकती है जन्म का क्या सम्बन्ध है विचारधारा से ? किसी आदमी के खून की जाँच से बता सकते हो की वो हिन्दू है या मुसलमान है या ईसाई है ?किसी आदमी की हड्डिया बता सकेगी की उसकी विचारधारा क्या थी - नास्तिक था या आस्तिक ?


धर्म से और जन्म का कोई संबध नहीं है


लेकिन यह देश हिन्दू मतांधो के हाथो में पड़ा जा रहा है इस देश में जो क्रांति हुई उसे क्रांति नहीं कहना चाहिए प्रतिक्रांति हो गई है यह देश हिन्दू मतांध लोगो के हाथ का शिकार हुआ जा रहा है चेष्टा यह है की क़ोई हिन्दू किसी दूसरे धर्म में न जा सके लेकिन कोई नहीं पुछता हिन्दू धर्म के ठेकेदारो से हिन्दू किसी दूसरे धर्म में जाना क्यों चाहते है और अगर जाना चाहते है तो उनके जाने के कारन मिटाओ अगर हिन्दू नहीं चाहते की हिंदु ईसाई न हो तो उनके जाने के कारण मिटाओ एक तरफ हरिजन दलितों को जिन्दा जलाते है उनकी स्त्रियों पर बलात्कार करते हो उनके बच्चों को भून डालते हो गाँव के गाँव बर्बाद कर देते हो आग लगा देते हो और दूसरी तरफ वे ईसाई भी नहीं हो सकते यह तो खूब स्वतंत्रता रही जीस धर्म में उनका जीवन भी संकट मैं


है उस धर्म में ही उन्हें जीना होगा इसको स्वतंत्रता कहते हो


लेकिन इस विधेयक को लाने वाले लोगो का कहना है की ईसाई लोगो को गरीबो और दलितों अदिवाशियो को भरमा लेते है हम भरमा ने के खिलाफ विधेयक बना रहे है


तुम नहीं भरमा पाते और ईसाई भरमा लेते है ?


इस विधेयक को लाने वालो का कहना है की ईसाई लोगो को धन पद नोकरी प्रतिष्टा शिक्षा भोजन अस्तपताल स्कूल ऐसी चीजे देकर भरमा लेते है तो हिन्दू पांच हजार सालो से क्या कर रहे है गरीब दलित आदिवाशीयो के लिए स्कूल नहीं खोल सके एक ढंग का अस्तपताल नहीं बना सके गरीबो को रोजी रोटी कपडा नहीं दे सके अगर ईसाई मशीनरी लोगो को रोजी रोटी कपडा दे कर भरमा रहे है तो यह सिर्फ हिन्दू और समस्त हिन्दू साधू संतो और नेताओ यह सिर्फ तुम्हारी लांछना है यह तो भारत के समस्त हिन्दू पर कलंक है कालिख पूत गई पांच हजार सालो में हम लोगो को रोटी रोजी भी नहीं दे पाये लोग इतने भूखे है इतने दिन इतने दुर्बल की रोटी रोजी के लिए धर्म बदल लेते है तो निशिचत हिन्दू धर्म की कीमत रोजी रोटी से ज्यादा नहीं है और हिन्दू धर्म ने दिया क्या है अगर दिया होता तो क्यों बदलते ? अगर देश के तमाम हिन्दू साहते हो की न बदले तो कुछ दो अस्तपताल खोलो स्कूल खोलो भेजो अपने साधू संतो को उनके दुःख दर्द बाटे हैम हिन्दुओ के पास 50 लाख हिन्दू साधू संत सन्याशी है भेजो इनको सेवा करे उनकी स्कूल चलाये अस्तपताल खोले मगर हिन्दू सन्याशी सेवा लेता करता नहीं उसने तो सदियों से सेवा ली है उनके पैर दबाओ उसके शरणो में सर रखो लोग थक गए है मूढो के शरणो में सर रखते रखते


थोथी बकवास थोथे सिद्धान्त पेट नहीं भरते भूखे भजन होही नहीं गोपाला


मेरे विचारो को मान लेना जरुरी नहीं इस इस पर विचार जरूर करना अगर इसमें कुछ सच्चाई होगी तो वो सच आपका अपना हो जायेगा

SADGURU OSHO KE PARVACHAN 

नसमकार

Tuesday, 1 April 2014

राजनीति और धर्म ः शरीर और आत्मा तो धर्मनिरपेक्ष कैसे

मेरे प्रिय आत्मन 
          धर्म जीवन को जीने की कला है जीवन को जीने का विज्ञान हम जीवन को उसके पुरे अर्थों मैं कैसे जिसे , धर्म उसकी खोजबीन है धर्म यदि जीवन-कला की आत्मा है तो राजनीति जीवन कला-कला का शरीर है ।  धर्म अगर प्रकाश है जीवन का तो राजनीति प्रथ्वी है । न आत्मा अकेली हो सकती है  न शरीर अकेला हो सकता है शरीर न हो तो आत्मा अदृश्य हो जाती है और खो जाती है और आत्मा न हो तो शरीर सड़ जाता है दुर्गन्ध देने लगता है धर्म कै बीना राजनीती सड़ा हुआ शरीर हो जाती है लेकिन स्मरण रहे राजनीति से धर्म विहीन धर्म भी अदृश्य हो जाता है और विलीन हो जाता है इसलिए धर्म और राजनीति पर कुछ कहने के पहले उन दोनों के बीच के आंतरिक संबंध को समझ लेना ज़रूरी है । 
जीवन मैं जो सक्रिय सत्ता है जीवन को बदलने का जो सक्रिय आंदोलन है जीवन को चलाने और निर्मित करने की जो व्यवस्था है उस सबका नाम राजनीति है राजनीति कै भीतरी अर्थ भी है शिक्षा भी है राजनीति कै भीतर हमारे पारिवारिक संबंध भी है । 
राजनीति कै भीतर हमारे हमारे सारे अंतसंबध है लेकिन भारत का दुर्भाग्य ही समझा जाना चाहिए कि हज़ारों वर्षों से राजनीति और धर्म बीच कोई संबंध नही रहा भारत मैं राजनीति और धर्म जैसे विरोधी रहे हो एक दुसरे की तरफ़ पीठ खड़े किये है 
और यह आज की ही बात नहीं है हज़ारों वर्षों से ऐसा हुआ है और उसका दुष्परिणाम भी भोगा है हमने भोगा है एक हज़ार वर्ष की ग़ुलामी उसका दुष्परिणाम है । हिन्दूस्थान ग़ुलाम हुआ क्योंकि हिन्दूस्थान के धार्मिक लोगों के मन मे ऐसा नहीं लगा कि उन्हें कुछ करना है धर्म का राजनीति से कोई संबंध ही नहीं था धार्मिक आदमी को लगता था कोई भी हो नृप हमें क्या हानि कोई भी राजा हो कोई भी सरकार हमें क्या प्रयोजन है कोई भी हो सत्ता मे हमें किया विचार की बात है धर्म को हमने हज़ारों वर्षों से राजनीति निरपेक्ष बना दिया है इसका बदला हिन्दूस्थान की राजनीति ने अभी अभी लिया उसने राजनीति को धर्म निरपेक्ष बना दिया हज़ारों वर्षों तक हिन्दूस्थान का धर्म राजनीति निरपेक्ष था उसका एक ही परिणाम होने को था । और अंतिम परिणाम यह हुआ कि हिन्दूस्थान की राजनीति अब धर्म निरपेक्ष है हज़ारों वर्षों तक धार्मिक आदमी कहता रहा कि राजनिति से हमें कुछ लेना देना नहीं है और राजनीति अभी बीस साल पहले बदला दिया और उसने कहा धर्म से हमें कुछ लेना देना नहीं लेकिन कोई राजनीति धर्म निरपेक्ष कैसे हो सकती है राजनीति कै धर्म निरपेक्ष होने का क्या अर्थ हो सकता है एक ही अर्थ हो सकता है जीवन मैं जो महत्वपूर्ण है जो भी श्रेष्ठ है राजनीति का उससे कोई प्रयोजन नही मनुष्य के ऊँचे से ऊँचे उठने की जो भी संभावनाये है राजनीति उसके संबंध मैं कोई भी सक्रिय भाग अदा नहीं करना चाहती धर्म निरपेक्ष होने का अर्थ होता है --सत्य से निरपेक्ष होना प्रेम से निरपेक्ष होना जीवन कै गहनतम ज्ञान से निरपेक्ष होना कोई भी राजनीति अगर धर्म निरपेक्ष होगी तो वही मनुष्य के शरीर मैं गहरा ज्यदा प्रवेश नहीं कर सकती और जो समाज या राष्ट केवल शरीर कै आस पास जीने लगता है उस समाज कै जीवन मे उसी तरह दुर्गन्ध पैदा हो जायेगी जैसे मरी हुई लाश मैं हो जाती है आज़ादी कै बाद भारत का सारा जीवन दुर्गन्ध से करूपता से ग्लानि से दुख और पीड़ा से भर गया शायद मनुष्य - जाती के इतिहास मैं कोई भी देश स्वतंत्र होकर इस भाँति कभी पतित नहीं हुआ है यह दुर्घटना कैसे घट सकी ? यह दुर्घटना घट सकी इसलिए कि जीवन को ऊँचे उठानेवाले जो भी सिद्धांत है उन सब सिद्धांतों का इकट्ठा नाम धर्म है और हमारे देश की राजनीति धर्म के प्रति निरपेक्ष है धर्म का उससे कोई प्रयोजन नहीं लेकिन राजनीतिज्ञों को यह दोष देना ग़लत होगा अगर हम पुराना इतिहास उठाकर देखें तो पता चलेगा कि हिन्दूस्थान के धार्मिक लोगों ने भी राजनीति कै साथ इतना ही ग़लत व्यवहार किया है वे आज तक कह रहे थे कि धर्म राजनीति से निरपेक्ष है राज्य ग़ुलाम हो जाए यहाँ स्वतंत्र देश दुष्टो के हाथों मैं जाए यहाँ अच्छे लोगों के हाथ में जाये कि कौन हकूमत करें कि किस भाँति हकूमत करें इससे धार्मिक आदमी को कोई प्रयोजन न था एक हज़ार वर्षों तक मुल्क ग़ुलाम था और हिन्दूस्थान कै साधु- संन्यासियो ने ज़रा भी इस ग़ुलामी को उखाड़ फेंकने का कोई प्रयास किया एक हज़ार साल की ग़ुलामी के इतिहास मैं हिन्दूस्थान कै संत ने एक बार भी यह आवाज़ नही दी कि इस मुल्क को आज़ाद होना है क्योंकी साधु संत कहते है हम राजनीति से क्या प्रयोजन । 
आश्चर्य की बात यह की साधु संतों को ग़ुलामी बुरी नहीं मालुम पड़ी आश्चर्य की बात है कि मुल्क की छाती पर दुश्मन सवार रहा मुल्क का खिन्न दुश्मन पीता रहा और मुल्क के साधु- संन्यासी स्वर्ग और परलोक की चर्चाये करते रहे मंदीरो मैं बैठ कर निर्मित महत्वपूर्ण है कि उतादान इस पर वे विचार करते रहे और मुल्क ग़ुलाम और पतित होता चला गया हिन्दूस्थान ग़ुलाम रहा आया क्योंकि हिन्दूस्थान के धार्मिक लोगों के मन में ऐसा नहीं लगा कि उन्हें कुछ करना है धर्म का राजनीति से कोई संबंध नहीं था एक हज़ार वर्षों तक हिन्दूस्थान 
के साधुओं और संन्यासियो और धार्मिक लोगों ने हिन्दूस्थान के भाग्य को बदलने को बदलने कै लिए कुछ नहीं किया स्वाभाविक था कि जब धर्म इतना निरपेक्ष रहा हो राजनीति तो राजनीति मुल्क में सत्ता आई तो उसने कहा धर्म से हमको कुछ लेना देना नहीं है यह बदला था लेकिन ग़लत चीज़ का बदला भी कभी यह नहीं होता है बदला भी ग़लत होता है ग़लत चीज़ का जो बदला लेते है वे भी ग़लत होते है पुनः अब विचारणीय हो गया है हम अपनी मनःस्थिति को पुनः तौल ले विचार करले कि क्या राजनीति और धर्म को इतने दुर रखना हितकार है क्या यह उचित है क्या यह योग्य है राजनीतिज्ञों को यह सहूलियत की बात थी कि धर्म राजनीति से दुर रहे क्योंकि जैसे ही राजनीतिज्ञ कै सामने धर्म प्रतिक खड़े हो जाते है राजनीतिज्ञ को नीचे गिरने की आसानी कम हो जाती है धर्म एक चुनौती है ऊपर उठाने के लिए धर्म एक पुकार है है कि निंरतर ऊपर उठते रहो धर्म एक आह्वान है कि मनुष्य को ऊँचे से ऊँचे शिखरों पर चढ़ना है राजनीतिज्ञ नहीं चाहता कि धर्म से राजनीति का कोई संबंध हो क्योंकि जैसे ही राजनीति का धर्म से कोई संबंध होता है राजनीतिज्ञ को अपने को बदलना पड़ेगा राजनीतिज्ञ नहीं चाहता कि धर्म का कोई राजनीति से हो क्योंकि जब धर्म से कोई संबंध हो तो उसे षड्यंत्र करने उसे निम्नतम व्यवस्था देने उसे चोरी और बेईमानी और असत्य का उपयोग करने की पुर्णतम सुविधा उपलब्ध हो जाती है उसके पीछे कोई भी आह्वान नहीं रह जाता है कि वही उप्र उठे राजनीति धर्म से अलग होकर सिर्फ़ कूटनीति रह जाती है राजनीति नही रह जाती वह पालिटिक्स नहीं होती सिर्फ़ डिप्लोंेसी होती है और जूठ और सच मैं कोई फ़र्क़ नहीं रह जाता 
                   भारत कै जलते प्रश्न ओशो 
                     प्रवचन 18 से संकलन 


Thursday, 12 September 2013

सच्चाई मुज़फरनगर के दंगो की !!!!!!!!!!!!!

दंगे होना असल में देश के लिए सबसे बड़ी असफलता की निशानी है। पहले सोचा की क्या लिखा जाये इन दंगो पर जब मन पहेले से ही देश की अर्थव्यवस्था के लिए ख़राब है। देश अभी बाहरी ही पीडाओ से व्यथित था अब अंदरूनी जखम हरे कर दिए गए है .

मुजफरनगर दंगे वास्तव में जैसा की मीडिया में पहले तो देर रिपोर्ट हुई फिर इसे बेवकूफाना रिपोर्टिंग के शिकार बनाया गया। मुझे जैसे की पहले से जानकारी है की मीडिया में एक दो को छोड़ कर बाकी सब कार्टून लोग भरे पड़े है जिनके चैनल का पत्रकार मर गया वो भी इस मुजफरनगर नहीं मुज्जफरपुर बता रहे थे। खैर जब देश पर ही कटपुतली और जोकर राज जमाये बैठे है तो इस पत्रकारों से तो शिकायत ही कुछ नहीं।

मुद्दा यह है की बहुत से लोग मुजफरनगर दंगो को बीजेपी की या संघ की करतूत बताते फिर रहे है अपनी अपनी सुविधा के हिसाब से। मैं जो वास्तव में सेकुलर दलों की निकृष्ट राजनीती को चिमटे से भी छूना पसंद नहीं करता उनका भी तात्कालिक दोष नहीं देना चाहता। असल में यह दंगे किसी भी पक्ष की रणनीति का परिणाम नहीं है वो चाहे मुस्लिम एक समाज के रूप में  भी क्यूँ न हो। यह जो हुआ वो वास्तव में एक हकीकत है जो की आज हर उस गाव, कसबे, जिले की इस देश में है जहाँ पर हिन्दू मुस्लिम एक अच्छी खासी मात्र में रहेते है। इसको न तो नेता रोक सकते , न प्रशासन, न ही पुलिस और न ही सेना। क्यूंकि खेल खेल में देश का  माहौल इतना ज्यादा विषाक्त कर दिया गया है जहा पर इनका महत्व ही ख़तम हो गया है। 
आप सेना और पुलिस से क्षणिक शांति तो करवा सकते है परन्तु कहाँ कहाँ और कितनी देर शांति होगी यह कहा नहीं जा सकता। 

देश में पिछले कुछ दशको से हिन्दुओ को जिस प्रकार से दुत्कारा गया है, एक घृणा का पात्र बनाया गया है यह उसकी एक खनक मात्र है। जैसा की पहले भी होता आया है जो आग लगाता है उसी को उस का शिकार भी बनना पड़ता है यह कोई आज की बात नहीं अनंत काल से यह ही होता आया है।

विशेष रूप से तथकथित बड़े राजीनीतिक दलों से कहेना चाहूँगा की जिस प्रकार हर दंगो के लिए संघ और बीजेपी को दोषी ठहराने के परम्परा चली है उस से प्रशासन ने अपनी काम करने आदत छोड़ दी। अब हालात यह है की पुलिस नामक तंत्र तो ख़तम हो चूका और सेना जिस पर की पाकिस्तान और चीन जिससे देश को बचाना है को देश की गालिओ में तैनात कर जा रहा है।  पता नहीं फिर नक्सलियो के खिलाफ सेना को उतारने में क्या दिक्कत है और कौन इसका विरोध  करते है।  

देश में दंगे पहेले बड़े शहरो में होते थे फिर ८ ० के दशक में छोटे शहरो में होने लगे परन्तु अब मुजफरनगर का दंगा गावो से शुरू हुआ है और पुलिस, नेता और सेना के बसकी नहीं इसको जल्द थामना। 

नेताओ के खेल खेल में जिसमे केंद्र की सरकार के सरताज मनमोहन सिंह के मुसलमानों के बारे में सिरे से परे के निम्न स्तर के बयान, कांग्रेस के महसचिव के कोढ़ में खाज पैदा करती टिप्पणिया जो टीवीट की माध्यम से अखबारों की सुर्खिया बनती है और बाकी के मुस्लिम वोटो के आशिको के भाषणों ने देश में अन्दर तक मक्कारी और जहर का बीज बो दिया।

मुजफरनगर के यह दंगे असल में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बहुत ही संवेदनशील मुद्दे के समय पर न्याय न मिलने के कारन ही है। न तो कोई हिन्दू मुद्दा है, न ही राम का मंदिर है और न ही किसी धर्म संसद की उतेजना है। मुद्दा है की हिन्दू अपनी बेहेन बेटी किसी नेता के कहेने या संविधान  में सेकुलर शब्द को घुसाने से मुसलमानों को नहीं दे सकता। आम हिन्दू वेदों में मलेछो के व्यक्तित्व से परिचित है और इसको किसी कांग्रेस के बाप की सरकार या किसी धर्मनिरपेक्षता की टोपी बदल नहीं सकती। हिन्दू बंट  सकता है कट सकता है पर बेहेन बेटी के मुस्लिम हाथो में देने का समझोता नहीं कर सकता। यह न तो मुंबई है न विदेश है और न ही "अमन की आशा "में पागल लोग यह पश्चिम उतर प्रदेश है । यह देश के सबसे संपन्न किसान काश्तकार का प्रदेश है । 

इस की शरुवात कुछ एसे हुई की एक मुस्लिम ने हिन्दू भाइओ की बेहेन के साथ बतमीजी की। जब की कुछ लोगो के बयानों को गौर से समझे तो यह बतमीजी से ऊपर का मामला था। भाइओ ने वो ही किया जो हर भाई करता है, उस मुस्लिम युवक से जा कर बात की जिस दौरान हाथापाई से एक व्यक्ति जान गवां बैठा जो एक एक क्षणिक आवेश में हादसा मात्र था। अब इतने पर कार्यवाही हो  जाती तो बात ख़त्म। परन्तु मुस्लिम तुष्टिकरण के हवाई जहाज पर सवार मुस्लिम, देश और प्रदेश में अपने लोगो की सरकार, मीडिया का हौंसला, संख्या का रौब, प्रशासन का साथ, हतियारो की खेप और गलोबल ताकत  ने कवाल गाँव के मुस्लिमो में एसा जोश भरा की इन दो बच्चो सचिन और गौरव को तालिबानी तरीको से सरे आम २ ० ० से ५ ० ० लोगो ने लातो, घूंसों, मुक्को से पीट पीट कर मौत के घाट उतार दिया। यह है इस दंगो की चिंगारी है जबकि पहेले हिन्दू बेहेन के साथ बलात्कार (जैसा की लोगो में जानकारी है ) की कोशिश हो चुकी । लोगो के पहले गुस्से के कारन है की जिस तरीके से इन दो युवको को मरा  गया है  वह लोगो को उत्तेजित कर गया, पश्चिम उतर प्रदेश समझने वाले जानते है की बात बात पर गोली चल जाती है, लोगो का तो यहाँ तक भी कहना है गोली भी इनको मार दी जाती तो शायद इतना बवाल न होता जितना इनकी अपने ही गाव के २००-४०० लोगो के एक साथ मिल कर मारने से हुआ है. क्या एक भी मुसलमान इतने बड़े गावं में इस हत्या का विरोध करने वाला न था। 

 बेचारे पीड़ित हिन्दू यहाँ पर भी रुक जाते परन्तु प्रशासन का जब दमनचक्र चला, जैसे सचिन और गौरव जिन तो युवको की मुस्लिमो ने हत्या की के ही घरवालो के खिलाफ पुलिस कार्यवाही, हिन्दुओ के पंचायत न करने देने की पुलिस के दमनात्मक कार्यवाही और पुलिस उपायुक्त जो की मुस्लिम ही था की हिन्दुओ के प्रति एक तरफ़ा कार्यवाही ने लोगो के अन्दर अपमान और गुस्से का एक मिश्रण सा घोल दिया। अभी तक इसमें न तो बीजेपी, सपा और न ही कोई और संघटन जुड़ा था। यह सब स्वाभाविक ही चल रहा था। इस बीच एक राजनेतिक खेल जरुर खेला गया की भारतीय किसान यूनियन जो के किसानो की बड़ी जोरदार आवाज हुआ करती थी एक समय में उसके नौजवान नेता पंचायत का नेत्रित्व करने और सपा के कहेने में न करने का जो फैसला किया उस से हिन्दू लोगो को इकठ्ठा होने के कारन मिल गया। अन्यथा मामला एक जाट और मुस्लिम के बीच ही ख़तम हो गया होता। और पोलिस इस पर कार्यवाही करती और गिरफ़्तारी करती। जब हिन्दुओ ने देखा की सचिन और गौरव को श्रदांजलि देने और हिन्दुओ को इकठ्ठा होने में भी प्रशासन सारा सर मुस्लिम समाज के साथ खड़ा है और पुलिस के लोग मुस्लिम से ही ज्ञापन भी ले रहे है और हिन्दुओ पर जो की पीड़ित है पर कार्यवाही कर रहे है तो फिर ग्रामीण लोगो ने फैसला लिया की एक जगह साथ मिलकर बात करेंगे जिसको की पंचायत का रूप दिया गया। अब जैसा की होता है बेचारे ग्रामीण अपनी ट्रेक्टर ट्रोली जो की एक मात्र साधन होता है पर एक साथ खड़े होने चल दिए। दंगा किसको कहेते है इस बात पर गौर करे की जिस जिस जगह से यह ग्रामीण निकले इनके ऊपर जैसा की प्रत्यदर्शियो ने बताया की अत्याधुनिक हतियारो से इनके ऊपर गोलिया चलाई गई जैसे ऐ के ४ ७ और अन्य शास्त्रों से। हिन्दुओ को एक तरफ मुस्लिमो ने घेर कर मारा और दूसरी तरफ से पुलिस ने कोई कार्यवाही मुस्लिम दंगाइयों के खिलाफ नहीं करी। इस के परिणाम यह हुए की जिले  में अफवाहों का बाजार गर्म हुआ और आननफानन में दो तरफ़ा कार्यवाही शुरू हो गई।

बात गौर करने की यह है की दंगे शहरो में नहीं गावो में शुरू हुए और पुलिस तो पुलिस सेना के लिए भी इनको तुरंत रोकना संभव नहीं है। 

भारत की सरकार प्रशासनिक रूप से गावो में दंगे रोकने के लिए तैयार नहीं परन्तु इनके नेता मोबिल , टीवी के माध्यम से अपने घटिया बयानों, भाव भंगिमाओ, तुष्टिकरण से आग लगा चुके है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश जो दिल्ली के लिए बहुत अहम् और गंभीर स्थल है में इस तरह का दंगा बहुत खतरनाक है। जिन लोगो ने मुस्लिम लोगो को भोला, मासूम, निरही माना वो पश्चिमी उतर प्रदेश आये और देखे की किस खूंखार तरीके से हिन्दुओ का नरसंहार किया जा रहा है। 

मुसलमानों में भी किसी रणनीति या संघटन की शक्ति नहीं इन दंगो के पीछे यदि ताकत है तो ऊँचे मनोबल, सत्ता में रसूख, प्रशासन की अकर्मण्यता पर भरोसा, लोकल मुस्लिम उद्योगपतियो का पैसा और गैर क़ानूनी अत्याधुनिक हतियारो का जमवाड़ा। जो सरकारे और पार्टी मुस्लिम आरक्षण और इनके उत्थान के बात कर रही है देख तो लो असल में किसके उत्थान और प्रस्थान की जरुरत है। 

निरही हिन्दुओ को भूखे भाडियो के सामने छोड़ने का खामियाजा तो भुगतना ही पड़ेगा परन्तु दंगे धीमी आंच के है और लम्बे समय तक देश के मन को देहला सकते है। 

सारा न्याय और धन एक तरफ परन्तु कोई नेता / पार्टी / सरकार हिन्दुओ से यह भी उमीद कर रही है की वो अपनी बहु बेटी भी धर्मनिरपेक्षता या मुस्लिम तुस्टीकरण के नाम पर लुटा देंगे तो वो अपनी हस्ती को मिटाने की और अग्रसर है। 

शायद बहुत कम लोगो को पता है के मुजफ्फरनगर का दंगाग्रस्त इलाका १ ८ ५ ७ की क्रांति का इलाका है जो पहले मेरठ जिले में ही होता था। और इसी खून ने लोगो में एक अजीब  जोश भर रखा है जैसे की पुरे हिंदुस्तान की दमनकारी निति इन्ही के ऊपर लागु हो रही हो।          

कांग्रेस / मीडिया / सेकुलर पार्टी / सरकार का पिछले १ ० साल से हिन्दुओ के अन्दर अपमान और घृणा का भाव और मुसलमानों में जोश और ताकत का अहसास ही इन दंगो की रीड है। इतिहास लिखने वाले भी हम पर हंसेगे की इस दौर में ऐसे भी सरकारे / पार्टी / नेता हुए है जो २ ० % लोगो को ८ ० % के खिलाफ हर दम प्रेरित करते है न की यह कहे सके की पाकिस्तान और बांग्लादेश ले चुके हो छोटे भाई की तरह रहो। 

देश में ऐसे नेताओ को जो कहे की हम तो बड़े मजे से गाये का मांस खाते है हिंदुस्तान में हमें तो मजा आता है, २ ५ करोड़ मुसलमान १ ० ० करोड़ हिन्दू को एक घंटे में ख़त्म कर देगा पुलिस तो हटा कर देखो, भारत माता को डायन कहेने वाला प्रदेश का रहनुमा बन जायेगा। उसके रहमो कर्म पर हिन्दुओ के फैसले होंगे। देश के संसाधन पर पहला हक़ उनको देने वाला प्रधानमंत्री होगा जिनको के पाकिस्तान और बांग्लादेश के रूप में अपना हक़ ले चुके है। प्रदेश का मुखिया सिर्फ और सिर्फ मुस्लिम लडकियो को वजीफे बांटेगा और हिन्दुओ को छोड़ देगा। तुष्टिकरण की पपरकाष्ठा।  

देश में और प्रदेश में अंधेर नगरी और चौपट राजा, टेक सेर भाजी टेक सेर खाजा। वहां दंगे नहीं होंगे तो क्या होगा। आग लगाने वाले तो बहुत है पर देखना मित्रो यह है की देश बचाने के लिए पानी कहाँ है ??? 

इन दंगो में असाम या मुंबई देखने से कुछ नहीं होगा और न ही सऊदी अरब और तालिबान देखने से, न ही इंडियन मुजाहिदीन और सिमी देखने से कुछ मिलेगा। आजाद हिंदुस्तान का यह वो दंगा है जो सालो से एक कौम के अन्दर जोधा अकबर, हिमायुं का मकबरा, शाहजहा का ताज महेल जैसे ख्याल गढ़े गए, फ़िल्मी लव जिहाद बनाया गया, ७ ८ ६ को रुतबा दिया गया, जब हिंदुस्तान को ही शहंशाह अकबर का दरबार बना दिया तो फिर हिन्दू की बेहेन बेटी को इज्जत कौन देगा और जब नहीं देगा तो मुजफरनगर ही होगा। 

और यह धधक एक जगह की नहीं उन लाखो कस्बो और गावों की है जहाँ पर हिन्दू को जलील अपमानित और उसके ही देश में उसको आतंकवादी बताया जा रहा है और दुसरो के पापा को आसाराम धारवाहिक में दबाया जा रहा है।

कहेने वालो को भी नहीं पता की देश की सुरक्षा एजेंसिओ पर ऊँगली उठाने वाले सेकुलर नेता / पार्टी / सरकार ने देश का कितना नुक्सान किया है, लोग कुंठित है एक कांग्रेस के महासचिव के बाटला हॉउस की थ्योरी से, गुजरात १३ साल से उबाऊ मीडिया कहानी से , आई बी और रा को क्षणिक लाभ के लिए उनको लांछित करने के लिए। जब लोकतंत्र में जनता ही शासक है तो शोषित बी वो क्यूँ ?    

मुस्लिम तुष्टिकरण के होते इन से हिन्दुओ को बचाने के लिए संसद में विधयक बनाने चाहिए न की मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए नए कानून।  copy by त्यागी जी ब्लोग 

Tuesday, 23 July 2013

क्या हम भारत के लोग उस मेडक जैसे हो गए है पढ़े इस bolg को

एक वैज्ञानिक ने मेडक पर शोध किया पहले एक मेडक को गरम पानी एक दम से डाला मेडक एक दम से छलांग लगा के पानी से बहार आ गया फिर एक बर्तन में ठन्डे पानी में मेडक के डाला फिर धीरे धीरे पानी को गरम करने लगा 24 घंटे तक मेडक ने कोई हलचल नहीं की तापमान को एडजेस्ट करता रहा और फिर जयादा गरम पानी हुआ तो मेडक मर गया हमारे देश में भी भ्रष्टाचार धीरे धीरे बढ रहा है एक दिन हमारा  देश मर जायेगा अगर एक दम से देश में  भ्रष्टाचार हुआ होता तो हम भी मेडक की तरह छलांग लगा कर बच जाते पर धीरे धीरे हमने एडजेस्ट कर लिया है आज हमें आदत हो गई है भ्रष्टाचार आतंकवाद सेकुलारिजम भ्रष्ट नेताओ की कभी हमने इमानदार नेता देखे ही नहीं एक नरेन्द्र मोदी जो इमानदार है उसके साथ भी हम खड़े नहीं हो पा रहे है यह देश के लिए बहुत खतरनाक है हमारी आने वाले हमारे ही पुश्ते हम पर थुकेगी जेसे हमें कहते हम पहले गुलामी इस हुए की हमारे पूर्वज कायर थे क्या हमारे बच्चे हमें कायर डरपोक कहे फैसला हम सब को करना है मैंने कर लिया है मैं मोदी के साथ हु क्या आप हो 

Monday, 22 July 2013

इस्लाम और जापान के बारे मे क्या यह सच है ?

इस्लाम और जापान के बारे मे क्या यह सच है ?
क्या आपने कभी यह समाचार पढ़ा कि किसी मुस्लिम राष्ट्र का कोई प्रधानमंत्री या बड़ा नेता तोकियो की यात्रा पर गया हो?
क्या आपने कभी किसी अखबार में यह भी पढ़ा कि ईरान अथवा सऊदी अरब के राजा ने जापान की यात्रा की हो?
कारण·
जापान में अब किसी भी मुसलमान को स्थायी रूप से रहने की इजाजत नहीं दी जाती है।·
जापान में इस्लाम के प्रचार-प्रसार पर कड़ा प्रतिबंध है।·
जापान के विश्वविद्यालयों में अरबी या अन्य इस्लामी राष्ट्रों की भाषाएं नहीं पढ़ायी जातीं।·
जापान में अरबी भाषा में प्रकाशित कुरान आयात नहीं की जा सकती है।
इस्लाम से दूरी·
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, जापान में केवल दो लाख मुसलमान हैं। और ये भी वही हैं जिन्हें जापान सरकार ने नागरिकता प्रदान की है।·
सभी मुस्लिम नागरिक जापानी बोलते हैं और जापानी भाषा में ही अपने सभी मजहबी व्यवहार करते हैं।·
जापान विश्व का ऐसा देश है जहां मुस्लिम देशों के दूतावास न के बराबर हैं।·
जापानी इस्लाम के प्रति कोई रुचि नहीं रखते हैं।·
आज वहां जितने भी मुसलमान हैं वे ज्यादातर विदेशी कम्पनियों के कर्मचारी ही हैं।·
परन्तु आज कोई बाहरी कम्पनी अपने यहां से मुसलमान डाक्टर, इंजीनियर या प्रबंधक आदि को वहां भेजती है तो जापान सरकार उन्हें जापान में प्रवेश की अनुमति नहीं देती है।
अधिकतर जापानी कम्पनियों ने अपने नियमों में यह स्पष्ट लिख दिया है कि कोई भी मुसलमान उनके यहां नौकरी के लिए आवेदन न करे।·
जापान सरकार यह मानती है कि मुसलमान कट्टरवाद के पर्याय हैं इसलिए आज के इस वैश्विक दौर में भी वे अपने पुराने नियम नहीं बदलना चाहते हैं।·
जापान में किराए पर किसी मुस्लिम को घर मिलेगा, इसकी तो कल्पना भी नहीं की जा सकती है।
यदि किसी जापानी को उसके पड़ोस के मकान में अमुक मुस्लिम के किराये पर रहने की खबर मिले तो सारा मोहल्ला सतर्क हो जाता है।·
जापान में कोई इस्लामी या अरबी मदरसा नहीं खोल सकता है।
मतांतरण पर रोक·
जापान में मतान्तरण पर सख्त पाबंदी है।·
किसी जापानी ने अपना पंथ किसी कारणवश बदल लिया है तो उसे और साथ ही मतान्तरण कराने वाले को सख्त सजा दी जाती है।·
यदि किसी विदेशी ने यह हरकत की होती है उसे सरकार कुछ ही घंटों में जापान छोड़कर चले जाने का सख्त आदेश देती है।·
यहां तक कि जिन ईसाई मिशनरियों का हर जगह असर है, वे जापान में दिखाई नहीं देतीं।
वेटिकन के पोप को दो बातों का बड़ा अफसोस होता है। एक तो यह कि वे 20वीं शताब्दी समाप्त होने के बावजूद भारत को यूनान की तरह ईसाई देश नहीं बना सके। दूसरा यह कि जापान में ईसाइयों की संख्या में वृध्दि नहीं हो सकी।
·जापानी चंद सिक्कों के लालच में अपने पंथ का सौदा नहीं करते। बड़ी से बड़ी सुविधा का लालच दिया जाए तब भी वे अपने पंथ के साथ धोखा नहीं करते हैं।·
जापान में 'पर्सनल ला' जैसा कोई शगूफा नहीं है। यदि कोई जापानी महिला किसी मुस्लिम से विवाह कर लेती है तो उसका सामाजिक बहिष्कार कर दिया जाता है। जापानियों को इसकी तनिक भी चिंता नहीं है कि कोई उनके बारे में क्या सोचता है। तोकियो विश्वविद्यालय के विदेशी अध्ययन विभाग के अध्यक्ष कोमिको यागी के अनुसार, इस्लाम के प्रति जापान में हमेशा यही मान्यता रही है कि वह एक संकीर्ण सोच का मजहब है। उसमें समन्वय की गुंजाइश नहीं है।
स्वतंत्र पत्रकार मोहम्मद जुबेर ने 9/11 की घटना के पश्चात अनेक देशों की यात्रा की थी। वह जापान भी गए, लेकिन वहां जाकर उन्होंने देखा कि जापानियों को इस बात पर पूरा भरोसा है कि कोई आतंकवादी उनके यहां पर भी नहीं मार सकता।

Friday, 19 July 2013

इस देश के हिन्दू खो चूके है अपना अष्टसिद्धि : : : : : तभी इस देश की हालत आज ये हो गई है :::::

१. जिस हिंदू की भुजाओं की जगह आँख फड़कनी शुरू हो गयी हो,,,,,,

२. जो हिंदू 'तलवार' उठाने की जगह 'सलवार' पहनने को तैयार है,,,,,

३. जिस हिंदू ने राम के नाम के साथ श्री लगाने मे डरते हुए खुद के आगे श्रीमती लगा लिया हो,,,,,,

४. जो हिंदू लज़्ज़ा की जगह सज़्ज़ा मे व्यस्त हो,,,,,,,

५. जिस हिंदू को वीर की जगह फकीर (मुल्लासाँई) पूजने की आदत पड़ गयी हो,,,,,,

६. जिस हिंदू को "जाग" मे भी "भाग" सुनाई देता हो,,,,,,

७. जो हिंदू "रक्त" के डर से मुल्ला "भक्त" बन गये हैं,,,,,,

८. जिन की ज़ुबान से बस ये निकलता है की वो क्या कर सकते हैं क्यों की सरकार के पास पुलिस है, सेना है,,,,,,

मेरा उनसे बस एक ही सवाल है की क्या वो ये किन्नर सरकार त्रिलोक विजेता लंकापति रावण से भी ज़यादा बलशाली है और क्या तुम सिर्फ़ उस वृद्ध जटायु से भी ज़यादा गये गुज़रे हो...अरे याद करो अंधो बचपन से देखा होगा की एक बूढ़ा जटायु सिर्फ़ अपनी चोंच के बल पर लड़ गया था महाबलशाली रावण से और बस अपनी चोंच से उस पापी को घायल कर के प्रभु श्री राम को रास्ता दिखा गये थे रावण के विनाश के लिए....यही वजह है की वो प्रभु के हाथो से सीधा मोक्ष पा कर अमर हो गया और तुम जीते जी ही मर चुके हो,,,, शायद इसीलिए प्रभु श्री राम ने गिद्धो को उपर बुला लिया क्यों की उनको भी हमारी नपुंसकता पर रोना आता रहा होगा,,,,

अरे अगर मन मे संघर्ष की भावना हो और प्रभु पर विश्वाश हो तो एक बूढ़ी चोंच ही काफ़ी है मोक्ष पाने और पापियों के विनाश के लिए वरना जल्द ही समय आ रहा है रावण के दरबार की नर्तकी बन कर मुज़रा गाने का,,,,

हे जटायु मुझे नही नाचना है रावण के दरबार मे, मुझे भी मोक्ष चाहिए बिल्कुल आप जैसा,,,,,,, किन्नरो फिर से बोलो की तुम्हारे पास क्या है...??? सरकार से लड़ने के लिए...?????? शर्म आती है हमें की एक गिद्ध थूक कर चला गया हम१०० करोड़ पर,,,,,,,

जागौ हिन्दूऔं,,,,,,,,, जागौ,,,,,,,,

Wednesday, 17 July 2013

हिन्दू अपने को हिन्दू नही Indian कहो सेक्युलरवाद है भाई

एक मोदी ने अपने को हिन्दू क्या बोल
दिया लगता है देश में भूचाल आ गया , इस देश के
हिन्दुओं की दयनीय स्थिति देखिए कि एक प्रदेश
का मुख्यमंत्री भी अब अपने को हिन्दू नहीं बोल
सकता | अब हालत यह हो गई है की देश में नवाज
शरीफ की जीत पर केरल में
पाकिस्तानी झंडा फहराया जा सकता है , इमाम
भुखारी अपने को ISI का एजेंट बोल सकता है , जम्मू
कश्मीर का मुख्यमंत्री अपने को मुस्लिम बोल
सकता है , आधे घंटे में 85 करोड़ हिन्दुओं को मिटाने
की बात हो सकती है किन्तु देश में एक प्रदेश
का मुख्यमंत्री तक अपने को हिन्दू नहीं बोल
सकता |कहीं यदि एक आम हिन्दू भी जोर से
चिल्ला कर अपने को हिन्दू बोल दे तो न जाने ये
सेकुलर उसे कहाँ ले जाकर मारेंगे | बहुत सो लिए अब
जाग जाओ |
तेरह करोड़ इक्यासी लाख अठासी हजार दो सौ चालीस
"13,81,88,240" मतलब 13.4% कुल इतने मुसलमान हैं भारत में और
१. कांग्रेस
२. बसपा
३. सपा
४. तृणमूल
५. टीएमसी
६. टीडीपी
७. जेडीयू
८. जेडीएस
९. राजद
१०. लोजपा
११. पीस पार्टी
१२. द्रमुक
१३. एनसीपी
१४. झामुमो
१५. सीपीएम
१६. बीजेडी
१७. सीपीएम
१८. सीपीआई
१९. एमआईएम
२०. नेशनल कांफ्रेंस
और भी कई छोटी बड़ी पार्टियाँ दिन रात इन मुसलमानों का वोट लेने के लिए बयासी करोड़ से ज्यादा (827,578,868) हिन्दुओं का अपमान पे अपमान किये जा रही हैं, 

क्या हिन्दुओं की वोट की कोई कीमत नहीं है?
सभी हिन्दुओं को कहो कि इन सब पार्टियों के खिलाफ़ वोट देकर सबक सिखा दो..!
ये लोग भविष्य में हिन्दुओं का अपमान करने की जुर्रत ना कर पाये,,

"वन्देमातरम"