Sunday, 25 November 2012

Jay Dharti Maa Jay Gou Maata

Kanuda Kaiyan Gayan Ne Bhulyo Re

Gayan Aayi Hai Le Fariyaad

Friday, 9 November 2012

एसे हैं मेरे राम एसे

सभी ललित  लला  हिन्दू धर्म मैं यह ही विशेस्ता हैं की माहाकाल कै मंदिर कै बाहर बैठ कर माहाकाल की बूराई कर सकता हैं इतनी आजादी ओर किसी धर्म  मै नहीं हैं भगवान राम पर राम जेठमलानी ने सवाल ऊठाये इस हिन्दू सनातन धर्म का कोई अपमान नहीं क्योंकि हिन्दू धर्म मान अपमान से परे हैं 1400 सालों हमले हो रहे हैं क्या हूआ कूछ ना समझ हैं जेठमलानी जैसे लोगो को  भगवान राम को समजने कै लिए राम जैसा बनाना पड़ेगा भगवान राम मानवता कै उदारक हैं भगवान राम कै बताये रास्ते पर आज का समाज सल रहा हैं कोई स्त्री अगर घर से बाहर रहे कर आएं तो उसका त्याग करना साहीए इस सीधानंत से कोई भी स्त्री अपनी मर्यादा ना लागे अगर भगवान राम माता सिता को वनवास नहीं देते तो हर ओरत भगवान राम की दूहाई दे कै किसी भी आदमी कै रह कर घर आती ओरतो को अपनी मर्यादा का भान कराने  कै लिए माता सिता को वन वास मिला मनूष्य जीवन कै आदर्श हैं भगवान राम भगवान राम पर प्रशन उठाने वाले नेतृत्व ओर मिड़ीया तूमारे कौनसे आदर्श हैं  एसे हैं मेरे राम भगवान हर्दय कमल कमल कूज तेज रामसा पूत्र  नहीं रामसा मित्र रामसा पति नही रामसा नहीं त्राता सारे जग कै प्रण हैं  राम रिषी मुनियो धायान  है राम गनधर्व का ज्ञान हैं  राम मर्यादा का भान हैं राम पतितो उथान  हैं राम धनूधारी धनवान हैं सम्पूर्ण हैं भगवान हैं राम एसे हैं मेरे राम


Monday, 5 November 2012

एक देश जो अपनी हि राष्ट भाषा से नजरें चूराता

पिछले दिनों आस्ट्रेलिया की प्रधान मंत्री ने हमारे आत्मसम्मान को ललकारते हुए कहा, ‘भारत अंग्रेज शासित देश है।’ ऐसा तब हुआ जब एक समिति ने आस्ट्रेलिया - भारत संबंधों को और बेहतर बनाने के लिए सभी राजनयिकों को हिन्दी सीखने का सुझाव दिया। इस सुझाव को वहाँ की प्रधानमंत्री ने अस्वीकार करते हुए उक्त टिप्पणी की। सच ही तो है, जो राष्ट्र स्वयं अपनी राष्ट्रभाषा से नजरें चुराता हैं उसे अपने स्वाभिमान को आहत कर देने वाली ऐसी टिप्पणियों के लिए तैयार रहना चाहिए। यह दुनिया का सबसे बड़ा आश्चर्य है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के इतने वर्ष बाद भी हम विदेशी भाषा अंग्रेजी की दासता से मुक्त नहीं हो पा रहे हैं। राजधानी दिल्ली का अधिकतर शासकीय कार्य विदेशी भाषा में होता है।

हर व्यक्ति के लिए आवश्यक ड्राईविंग लाईसंेस पर एक भी शब्द हिन्दी का नहीं। इस सप्ताह हिन्दी, पंजाबी, उर्दू अकादमी तथा साहित्य कला परिषद के संयुक्त तत्वावधान में हो रहे सांस्कृतिक कार्यक्रम के निमंत्रण पत्र में हिन्दी, पंजाबी अथवा उर्दू का एक भी शब्द नहीं। सब अंग्रेजी में होना क्या साबित करता है? क्या स्व-भाषा या राष्ट्रभाषा हिन्दी में कुछ कमी है? सत्य यह है कि हम हीनता-ग्रन्थि के शिकार होकर अनेक भ्रम व पूर्वाग्रहण पाले हुए हैं। आज अंग्रेजी माध्यम के स्कूल लोकप्रिय हो रहे हैं। हमारे बच्चों को हिन्दी में गिनती भी नहीं आती। क्या यह हमारे लिए शर्मनाक बात नहीं है? दरअसल हम भ्रम का शिकार है कि अंग्रेजी अकेली अन्तर्राष्ट्रीय भाषा है जो पूरी दुनिया में समझी व बोली जाती है। सच्चाई यह है कि संयुक्त राष्ट्रसंघ में छह भाषायें चलती हैं। फ्रेंच, अंग्रेजी, रूसी, चीनी, और अरबी।

भारत की कुल जनसंख्या में आधे से अधिक लोग हिन्दी बोलते समझते व लिखते हैं। अन्य विदेशी भाषियों से हिन्दी कई गुना अधिक बड़ी है फिर भी संयुक्त राष्ट्रसंघ ने हिन्दी को स्वीकृति नहीं दी है तो इसका कारण हमारे प्रयासों का खोखलापन है, हिन्दी का नहीं। कितने लोग मानते हैं कि विश्व की अन्तर्राष्ट्रीय डाक भाषा अंग्रेजी नहीं, फ्रेंच है। अंग्रेजी तो अपने देश इंग्लैंड में भी बड़ी मुश्किल से राष्ट्रभाषा बन सकी थी। फ्रांस में ऐसे 4000 शब्दों की सूची बनाई गई है जो उनकी भाषा में जबर्दस्ती घुस गए थे। एक विधेयक पारित कर इन शब्दों के फ्रेंच में इस्तेमाल रोकने का आदेश दिया गया।

मेरा स्वयं का अनुभव है कि फ्रांसवासियों में स्व-भाषा के प्रति जबरदस्त आदर है। वे अपनी भाषा को अंग्रेंजी से बेहतर मानते हैं। नीदरलैंड में अंग्रेजी हटाने के लिए एक आंदोलन हुआ क्योंकि उनके अनुसार डच भाषा व संस्कृति को इससे खतरा है। चीन, जापान, कोरिया और वियतनाम में सरकारी फरमान या आदेश अंग्रेजी में आने पर जनता तीव्र विरोध प्रकट करती है। जापानी भाषा दुनिया की सबसे कलिष्ट है। उसकी लिपि में 5000 से अधिक चिन्ह हैं। लेकिन उसके बावजूद वे हर कार्य अपनी भाषा में ही करना पसंद करते हैं।

अंग्रेजी के बिना ही जापान ने जबरदस्त उन्नति की है। उसके इलैक्ट्रोनिक सामान व उपकरण बनाने में विश्व में सर्वोच्च स्थान प्राप्त देश है जिसके माल की खपत हर जगह है। यही दशा चीन की भी है, जो आज सारी दुनिया के बाजारों पर कब्जा जमा रहा है। अनेक देशों जिनमें लीबिया, ईराक व बांग्लादेश शामिल है ने एक झटके में अंग्रेजी को निकाल बाहर कर दिया।

कर्नल गद्दाफी ने तो सेना को छह मास में अंग्रेजी हटाने का आदेश दे दिया। ईराक के पिछले शासक ने तो यहाँ तक कह दिया था कि जिसे अंग्रेजी पढ़नी हो वे ईराक छोड़ दें। बांग्लादेश ने ईसाई मिशनरी के संदर्भ में कहा कि इनकी अंग्रेजी से हमारी बंगाली भाषा को खतरा है। माओत्से तुंग ने सत्ता पर काबिज होते ही पूरे चीन में एक ही चीनी भाषा लागू कर दी, जबकि पहले वहां भी 6-7 क्षेत्रीय भाषाएं थी। एक चीनी भाषा होने के कारण भाषायी एकता होने से सभी चीनी स्वयं को एक सूत्र में जुड़े अनुभव करते हैं। स्पष्ट है कि अंग्रेजी कोई सर्वसम्मत अंतर्राष्ट्रीय भाषा नहीं है, जैसा कि हम समझते हैं। यह भी सभी को ज्ञात है कि अंग्रेजी वैज्ञानिक भाषा भी नहीं है। स्वयं अंग्रेज साहित्यकार बर्नाड शा इसे अराजक भाषा घोषित कर चुके हैं क्योंकि हर ध्वनि के लिए कोई तयशुदा शब्द नहीं है। इसके विपरित हिन्दी पूर्णतः वैज्ञानिक भाषा है। विदेशी भाषा की गुलामी अनावश्यक है। जो लोग यह तर्क देते है कि बेहतर क्षमता के लिए अंग्रेजी आवश्यक है उन्हें कौन समझाये कि तमिलनाडु में तीन मुख्यमंत्री सर्वश्री कामराज, एम.जी.रामचंद्रन व करूणनिधि को अंग्रेंजी का ज्ञान नहीं था तो भी उनका काल किसी भी तरह से कमतर नहीं कहा जा सकता।

कुछ लोग अंग्रेंजी को बनाये रखने के लिए क्षेत्रीय भाषाओं को हिन्दी से लड़ाने की कोशिश कर रहे हैं जबकि तथ्य यह है कि दोनों एक दूसरे की पूरक है। यदि क्षेत्रीय भाषाओं को खतरा है तो विदेशी भाषा से है। राष्ट्रभाषा सम्पूर्ण राष्ट्र के हृदयों को जोड़ती है। सम्पर्क भाषा बनकर आपसी संबंध सुदृढ़ बनाती है। हिंदी पूरे भारत की भाषा है। वह साहित्य की जननी, सभ्यता की पोषिका एवं संस्कृति की प्रेरणा है। श्री गोपालसिंह नेपाली ने एक जगह कहा है - हिंदी में गुजराती का संजीवन है, मराठी का चुहल (विनोद) है, कन्नड का माधुर्य है एवं है संस्कृत का अजस्र स्रोत। प्राकृत ने इसका श्रृंगार किया है और उर्दू ने इसके हाथों में मेंहदी लगाई है। यह आर्यों के स्वरों में गाती है और अनार्यों के ताल पर नाचती है। हिंदी राष्ट्रभाषा है। वस्तुतः हिंदी एक परंपरा का नाम है, एक सततवाहिनी सरिता का नाम है, जिसमें असंख्य नद-नालों की अंजलियां समर्पित होती रहती हैं, जिसमें पूरे भारत के प्राण तरंगित होते रहते हैं।’ हिन्दी को सबसे ज्यादा प्रोत्साहन अहिन्दीभाषियों ने दिया। 1918 में बंगाली लेखक नलिनी मोहन सान्याल ने लंदन विश्वविद्यालय में हिन्दी में शोध् ग्रंथ प्रस्तुत किया। ब्रह्म समाज के नेता बंगला-भाषी केशवचंद्र सेन से लेकर गुजराती भाषा-भाषी स्वामी दयानंद सरस्वती ने जनता के बीच जाने के लिए जन-भाषा हिन्दी सीखने का आग्रह किया। गुजराती भाषी महात्मा गांधी, मराठी-भाषी काका कालेलकर ने सारे भारत में घूम-घूमकर हिन्दी का प्रचार-प्रसार किया।

नेताजी सुभाषचंद्र बोस की आजाद हिन्द फौज की भाषा हिन्दी ही थी। महर्षि अरविंद घोष हिन्दी-प्रचार को स्वाधीनता-संग्राम का एक अंग मानते थे। न्यायमूर्ति श्री शारदाचरण मित्र कहा करते थे- यद्यपि मैं बंगाली हूं तथापि इस वृद्धावस्था में मेरे लिए वह गौरव का दिन होगा जिस दिन मैं सारे भारतवासियों के साथ हिन्दी में वार्तालाप करूंगा।’ बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय और ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने भी हिन्दी का समर्थन किया था। आज भी तमिलनाडू निवासी डॉ. बालशौरि रेड्डी से पंजाब के डॉ. हरमहेन्द्र सिह बेदी तक, जम्मू-कश्मीर के डॉ. चमनलाल सप्रू से शिलांग के अकेला भाई तक साहित्य के माध्यम से हिन्दी सेवा में सक्रिय है। वर्धा में स्थापित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय जिसके वर्तमान कुलपति डा.गोपीनाथन मलयालम भाषी है, इस दिशा में बहुत महत्वपूर्ण कार्य कर रहा है। दुनिया के पचास से अधिक देशों हिन्दी में पठन-पाठन की सुविधा है। अनेक देश हिंदी कार्यक्रम प्रसारित कर रहे हैं, जिनमें बीबीसी, यूएई क़े हम एफ-एम, जर्मनी के डॉयचे वेले, जापान के एनएचके वर्ल्ड और चीन के चाइना रेडियो इंटरनेशनल की हिंदी सेवा विशेष रूप से उल्लेखनीय है। हिन्दी की वर्तमान दशा के लिए हमारी शिक्षा पद्धति और शासन व्यवस्था-दोनों जिम्मेदार हैं।

अगर देश पर हावी अंग्रेजियत को हटाना है तो शिक्षा पद्धति में आमूलचूल परिवर्तन लाना होगा। पहली से लेकर 10 कक्षा तक की शिक्षा से भारतीय भाषाओं का प्रयोग अनिवार्य करना होगा। विज्ञान, भूगोल आदि की पढ़ाई मातृभाषा में ही कराने का प्रावधान करना होगा। उसके बाद भी अंग्रेजी को एक अतिरिक्त विषय के रूप में पढ़ाया जाना चाहिए। जब एक व्यक्ति अपनी भाषा में प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करेगा, तो उस भाषा के प्रति उसका मोह और सम्मान आजीवन बना रहेगा। हिन्दी की मौजूदा स्थिति के लिए प्रशासन भी कम दोषी नहीं है। संसद से लेकर निम्न पदों तक सभी कार्य अंग्रेजी भाषा में किये जाते हैं। क्या संसद में हिन्दी भाषा में काम-काज नहीं यिका जा सकता? तर्क दिया जाता है कि सभी लोग हिन्दी नहीं जानते। क्या कभी उनसे पूछा गया है कि सभी लोग अंग्रेजी भी नहीं जानते।

अंग्रेजी जानने वालों का प्रतिशत हिन्दी भाषा जानने वालों से बेहद कम है, इस तथ्य को जानने के बाद भी मातृभाषा में काम क्यों नहीं किया जाता? अगर समस्या तेलुगू, बंगाली या अन्य क्षेत्रीय भाषाओं की है तो उनके लिए अनुवादक नियुक्त किये जा सकते हैं। सूचना प्रौद्योगिकी के विकास का इस्तेमाल बखूबी कर सकते हैं। हम भारतीयों को अपनी उस मानसिकता में बदलाव लाना होगा कि हिन्दी जानने वाले व्यक्ति का बौद्धिक स्तर अंग्रेजी भाषा जानने वाले व्यक्ति के बराबर नहीं हो सकता, वह शीर्ष पर नहीं पहुंच सकता। इस तरह की मानसिकता में बदलाव लाने की जिम्मेवारी सिर्फ सरकार की नहीं है। हिन्दी के प्रचार-प्रसार और सम्मान के लिए हम सभी को स्वयं आगे आना होगा। साल में एक बार ‘हिन्दी दिवस मनाने जैसे कर्मकाण्ड से ही हिन्दी को वह सम्मान नहीं मिल सकता, जिसकी वह हकदार है। आईए स्वयं से ही शुरूआत करें।by ibtl web copy www.ibtl.com

Sunday, 4 November 2012

आपका समर्थन ही हमारी ताकत हैं

मैं आज एक बुजुर्ग से मिला वो कांग्रेस कै समर्थक नरेंद्र मोदी भगत सिंह जैसे लोगों को आतंकवादी कैहते हैं उनकी नजर मैं कांग्रेस कै अलावा देश का उदारक कोई नहीं
उनकी एक बात दिल मैं बैठ गईं उनका कैहना हैं 80% हिन्दू हैं फिर भी अपनी सरकार नहीं 15% मुस्लिम हैं फिर भी सरकार उनकी हैं आज इस देश मैं किसी भी हिन्दू को पुलिस गिरपतार कर लैती हैं हमारे धर्मगूरू बाबा राम देव जैसे लोगों को लाठीचार्ज होता हैं हम चूप रेहतै हैं ओर जमा मस्जिद का इमाम आतंकवादी हैं हिन्दूस्थान की पुलिस मैं ताकत हैं नहीं  उसे गिरपतार  करें इसलिए कांग्रेस कांग्रेस समर्थक हू उनका कैहना हैं कियोकी हिन्दू खूद अपना विनाश साहते हैं मैं एक आम आदमी आपसे एक बात कैहना साहता हू अगर मोदी ही देश को चाहिए तो वो जो लोगों खूद कूछ कर सकते हैं उठो गाँव गाँव शेहर शेहर हिन्दूओ को
जगाओ आप अच्छा लिखते हो तो लिखो अच्छा बोलते हो तो भाषण दो कूछ जो आप करो अगर फेसबूक या सोसल मै अच्छा लिखते हैं उनका होचला बढाओ शेयर करो लाइक करो कोमेनट करो आपका समर्थन ही हमारी ताकत हैं