Wednesday, 19 December 2012

English vigalish

जीतना नूकसान सनातन धर्म को इस्लाम से नहीं होगा उतना नूकसान अग्रेजो की बनाइ हूई
अग्रेजी शीक्षा व्यवस्था से होगी आज हमारे देश कै माता पिता हर आदमी ईसाई स्कूलो मैं पढ़ने भैजते हैं यहाँ पर बच्चे जाते हैं हिन्दू आते हैं अग्रेज बन कर फिर उनका धर्म भगवान मैं भरोसा नहीं रहता आज मेने बोहत करीब से मेने भारत को तिल तिल मरते देखा हैं आप भी देख रहे हैं भारत कै लोकतंत्र कै मंदिर मैं सिर्फ इगलिस बोली जाती अफशोस यह हैं जब हमारी भाषा ही खतम हो जायगी तब?

Sunday, 16 December 2012

एक संस्कृति जो खातमे कै कागार पर बेचारे हिन्दू ?

देश को आजाद हुए चोसठ सालो से भी अधिक हो चुके है लेकिन इस देश में न तो सव्देशी विचारधारा को बचाने के लिए कुछ हुआ और न ही हमारे नेताओं में सव्देशी विचारधारा पैदा हुई . बताया जा रहा है की लीबिया एक तानाशाह से मुक्त हो चुका है आजाद देश की घोषणा होते ही यह घोषणा भी हुई की लीबिया में अब सभी क़ानून इस्लामिक होंगे सभी गैर इस्लामिक कानूनों को खत्म कर दिया जायेगा .पाकिस्तान भी खुद को इस्लामिक देश ही कहता है .शायद किसी भी देशवासी के देश प्रेम की भावना को जगाने के लिए उस देश के नागरिक का अपनी सभ्यता संस्कृति ,भाषा से जुड़ा होना आवश्यक होता है यही बात शायद इस्लामिक मुल्क बेहतर ढंग से जानते है . लेकिन हमारे भारत वर्ष में आजादी के बाद से ही हमारी संस्कृति को तोड़ने भाषा को तोड़ने के षड्यंत्र रचे जाते रहे है यहाँ न तो अपनी भाषा है बल्कि एक विदेशी भाषा अंग्रेजी को महारानी बनाया जा रहा है . कुछ एसा माहोल तैयार किया जाता रहा है की हमारे अपने लोग ही अपनी ही संस्कृति को जान नही पा रहे है . संस्कृति तो छोड़िए इस देश का कोई एक नाम ही नही बचा कोई इसे अंग्रेजो के दिए नाम इंडिया से पुकारता है तो कोई मुगलों के नाम से हिन्दुस्तान तो कोई भारत वर्ष को भारत के नाम से उन्हें हिन्दुत्त्व का मतलब आज कट्टरवाद बताया जाता है . संस्कृति ,धर्म को इस देश में रुढ़िवादी बताया जाता है जब की सच्चाई तो यही है की धर्म और संस्कारों के बिना देशभक्ति की भावना नही जाग सकती .यही बात गांधी जी जानते थे सरदार पटेल जानते थे और शायद आडवाणी जी भी . कुछ शक्तिया इस देश पर इस्लाम को रंगना चाहती है तो कुछ शक्तिया इसाइयत को . इन दोनों श्कतियो का मुकाबला करने वाला इस देश में शायद कोई नेता बचा नही बचा है तो वह सत्ता शीर्ष तक पहुचने में सक्षम नही या उसे पहुचने दिया नही जा रहा उस जगह तक . चुकी उन शक्तियों को मालूम है की इस तरह का कोई शख्स इस देश का सर्वेसर्वा बना तो उन देशद्रोहियों और विदेशी शक्तियों को मुश्किल हो सकती है तभी प्रचार और दुष्प्रचार या फिर कुछ एनजीओ टैप लोगो को खड़ा कर दिया गया है जो हर सही बात गलत ठहराते है .जैसे धर्मान्तरण का विरोध करने वाले गुंडे साम्प्रदायिक .देश द्रोहियों कश्मीर के खिलाफ बोलने वालो की पिटाई करने वाले गुंडे पुराने ख्यालो के ,अभिव्यक्ति की आजादी को दबाने वाले . कश्मीर खिलाफ बोलने वाले अभिव्यक्ति की आजादी . हिन्दू धर्म पर ऊँगली उठाने वालो को यदि कोई पिटे तो देशभक्तों को गुंडा करार देना . इसी के अंतर्गार्ट आता है पश्चिमी कानूनों को भारत पर लादना जैसे लिव इन रिलेशनशिप ये एक एसा कानून है जिसकी स्थापना ठीक पश्चिमी देशो की नकल पर तो हुई ही है साथ ही इसका एकमात्र लक्ष्य भारतीयों को उनके रीती रिवाज से दूर करना और हमारे पारिवारिक ढाँचे को तोड़ना है . जिस तरह का खेल भारत में रचा जा रहा है उससे साफ़ है की आने वाली पीढ़ी देशभक्ति हिन् ,कमजोर और भारत की संस्कृति में विशवास न रखने वाली होगी .उसका एक ही मकसद होगा बीअर बार में बैठना और दो तीन गर्ल्फरैंड रखना ,बाइक पर घूमना . लेकिन हो सकता है की कभी भारत के कुछेक लोगो का सवाभिमान पहले ही जाग जाए लेकिन चर्च पोषित मीडिया उसे नही जागने देगा जैसे प्रशांत भूषण या फिर गिलानी ,अरुंधती के बयानों को अभिव्यक्ति की आजादी बता दिया जाता है यही षड्यंत्र आगे भी जारी रहेगा . यदि कोई इसका विरोध करेगा तो वह गुंडा ,विरोध का यह तरीका सही नही है इस तरह की खबरों से उसे दबा दिया जायेगा . इसलिए भारत को आज एसा प्रधानमन्त्री चाहिए जो उसे भारतीयता से जोड़ सके देशभक्ति की भावना को जगा सके और युवाओं का खोया स्वाभिमान जगा सके .

Tuesday, 11 December 2012

क्या कोई भारत को बचा सकता हैं इस माहावीस्पोट से

गुरुत्वाकर्षण तो भौतिक दबाव हे; लेकिन चारों तरफ से लोगों की मोजूदगी भी हमको दबा रही है। वे भी हमें भीतर की तरफ प्रेस कर रहे है। सिर्फ उनकी मौजूदगी भी हमें परेशान किये हुए है। अगर यह भीड़ बढ़ती चली जाती है। तो एक सीमा पर पूरी मनुष्‍यता के ‘’न्‍यूरोटिक’’ विक्षिप्‍त हो जाने का डर है।सच तो यह है कि आधुनिक मनोविज्ञान, मनोविश्‍लेषण यह कहता है कि जो लोग पागल हुए जा रहे है, उन पागल होने वालों में नब्‍बे प्रतिशत पागल ऐसे है जो भीड़ के दबाव को नहीं सह पा रहे है। दबाव चारों तरफ से बढ़ता चला जा रहा है। और भीतर दबाब को सहना मुश्‍किल हुआ जा रहा है। उनके मस्‍तिष्‍क की नसें फटी जा रही है। इसलिए बहुत गहरे में सवाल सिर्फ मनुष्‍य के शारीरिक बचाव का नहीं है। फिजिकल सरवाइवल का ही नहीं है। उसके आत्‍मिक बचाव का भी है।जो लोग यह कहते है कि संतति नियमन जैसी चीजें अधार्मिक है। उन्‍हें धर्म का कोई पता नहीं है। क्‍योंकि धर्म का पहला सूत्र है कि व्‍यक्‍ति को व्‍यक्‍तित्‍व मिलना चाहिए। और व्‍यक्‍ति के पास एक आत्‍मा होनी चाहिए। व्‍यक्‍ति भीड़ का हिस्‍सा न रह जाये।लेकिन जितनी भीड़ बढ़ेगी,उतना ही हम व्‍यक्‍तियों की फिक्र करने में असमर्थ हो जायेंगे। जितनी भीड़ ज्‍यादा हो जायेगी। उतनी हमें भीड़ की फिक्र नहीं करनी पड़ेगी। जितनी भीड़ ही हमें पूरे जगत की इकट्ठी फिक्र करनी पड़ेगी। फिर यह सवाल नहीं होगा की आपको कौन सा भोजन प्रीतिकर है, और कौन से कपड़े प्रीतिकर हे और कैसे मकान प्रीतिकर हे। तब ये सवाल नहीं है। कैसा मकान दिया जा सकता है भीड़ को, कैसे कपड़े दिये जा सकते है भीड़ को, कैसा भोजन दिया जो सकता है भीड़ को। यह सवाल होगा। तब व्‍यक्‍ति का सवाल विदा हो जाता हे और भीड़ के एक अंश की तरह आपको भोजन कपड़ा और अन्‍य सुविधाएं दी जा सकती है।अभी एक मित्र जापान से लौटे है, वे कह रहे थे कि जापान में घरों की कितनी तकलीफ है। भीड़ बढ़ती चली जा रही है। एक नये तरह के पलंग उन्‍होंने ईजाद किये है। आज नहीं कल हमें भी ईजाद करने पड़ेंगे। वे मल्‍टी-स्‍टोरी पलंग है। रात आप अकेले सो भी नहीं सकते। सब खाटें एक साथ जुड़ी हुई है। एक के उपर एक। रात मैं जब आप सोते है, तो अपने नम्‍बर की खाट पर चढ़कर सो जाते है। आप सोने में भी भीड़ के बाहर नहीं रह सकते है। क्‍योंकि भीड़ बढ़ती चली जा रही है। वह रात आपके सोने के कमरे में भी मौजूद हो जायेगी। पर दस आदमी एक ही खाट पर सो रहे हो। तो वे घर कम रह गया,रेलवे कम्‍पार्टमेंट ज्‍यादा हो गया। रेलवे कम्‍पार्टमेंट में भी अभी ‘’टेन-टायर’’ नहीं है। लेकिन दस में भी मामला हल नहीं हो जायेगा।अगर यह भीड़ बढ़ती जाती है तो यह सब तरफ व्‍यक्‍ति को एन्‍क्रोचमेंट करेगी। वह व्‍यक्‍ति को सब तरफ से घेरे गी सब तरफ से बंद करेगी। और हमें ऐसा कुछ कना पड़ेगा कि व्‍यक्‍ति धीरे-धीरे खोता ही चला जाये, उसकी चिंता ही बंद कर देनी पड़े।मेरी दृष्‍टि में मनुष्‍य की संख्‍या का विस्‍फोट,जनसंख्‍या का विस्‍फोट बहुत गहरे अर्थों में धार्मिक सवाल है। सिर्फ भोजन का आर्थिक सवाल नहीं है।जब परिस्थितियां बदल जाती है तब पुराने नियम विदा हो जाते है।लेकिन, आज भी घर में एक बच्‍चा पैदा होता है, तो हम बैंड बाजा बजवाते है, शोरगुल करते है, प्रसाद बांटते है। पाँच हजार साल पहले बिलकुल ऐसी ही बात थी। क्‍योंकि पाँच हजार साल पहले दस बच्‍चे पैदा होते थे, तो सात और आठ मर जाते थे। और उस समय एक बच्‍चे का पैदा होना बड़ी घटना थी। समाज के लिए उसकी बड़ी जरूरत थी। क्‍योंकि समाज में बहुत थोड़े लोग थे। लोग ज्‍यादा होना चाहिए। नहीं तो पड़ोसी शत्रु के हमले में जीतना मुश्‍किल हो जायेगा। एक व्‍यक्‍ति का बढ़ जाना बढ़ी ताकत थी। क्‍योंकि व्‍यक्‍ति ही अकेली ताकत था। व्‍यक्‍ति से लड़ना था। पास के कबीले से हारना संभव हो जाता। अगर संख्‍या कम हो जाती है। तब संख्या को बढ़ाने की कोशिश करना जरूरी था। संख्‍या जितनी बढ़ जाये, उतना कबीला मजबूत हो जाता था। इसलिए संख्‍या का बड़ा होना महत्‍व पर्ण था।लोग कहते थे कि हम इतनी करोड़ है। उसमें बड़ी अकड़ थी। उसमें बड़ा अहंकार था। लेकिन वक्‍त बदल गया है, हालत बदल गई है उलटी हो गई है। नियम पुराना चल रहा है। हालतें बिलकुल उल्‍टी हो गई है।अब जो जितना ज्‍यादा संख्‍या में है। वह उतनी ही जल्‍दी मरने के उपाय में है। तब जोजितनी ज्‍यादा संख्‍या में था। उतनी ज्‍यादा उसके जीतने की संभावना थी। आज संख्‍या जितनीज्‍यादा होगी,मृत्‍यु उतनी ही नजदीक हो जायेगी।आज जनसंख्‍या का बढ़ना स्युसाइडल है, आत्‍मघाती है।आज कोई समझदार मुल्‍क अपनी संख्‍या नहीं बढ़ा रहा है, बल्‍कि समझदार मुल्‍कों में संख्‍या गिरने तक की संभावना पैदा हो गयी है। जैसे फ्रांस की सरकार थोड़ी चिंतित हो गयी है क्‍योंकि कहीं ज्‍यादा न गिर जाए, यह डर भी पैदा हो गया है। लेकिन कोई समझदार मुल्‍क अपनी संख्‍या नहीं बढ़ा रहा।संख्‍या के बढ़ने के पीछे कई कारण है। पहला कारण तो यह है कि यदि जीवन में सुख चाहिए तो न्‍यूनतम लोग होने चाहिए। अगर दीनता चाहिए, दु:ख चाहिए,गरीबी चाहिए, बीमारी चाहिए, पागलपन चाहिए तो अधिकतम लोग पैदा करना उचित है।जब एक बाप अपने पांचवें बच्‍चे के बाद भी बच्‍चे पैदा कर रहा है तो वह बच्‍चे का बाप नहीं, दुश्‍मन है। क्‍योंकि वह उसे ऐसी दुनिया में धक्‍का दे रहा है, जहां वह सिर्फ गरीबी ही बांट सकेगा। वह बेटे के प्रति प्रेम पैदा करना अब प्रेम नहीं सिर्फ नासमझी है और दुश्‍मनी है।आप दुनियां में समझदार मां-बाप हो सकते है, इस बात को सोचकर की आप कितने बच्‍चे पैदा करेंगे। आने वाली दुनिया में संख्‍या दुश्‍मन हो सकती है। कभी संख्‍या उसकी मित्र थी, कभी संख्‍या बढ़ने से सुख बढ़ता था, आज संख्‍या बढ़ने से दुःख बढ़ता है। स्‍थिति बिलकुल बदल गई है।आज जिन लोगों को भी इस जगत में सुख की मंगल की कामना है, उन्‍हें यह फिक्र करनी ही पड़ेगी कि संख्‍या निरंतर कम होती चली जाए।हम अपने को अभागा बना सकते है, हमें उसका कोई भी बोध नहीं, हमें उसका कोई भी खयाल नहीं।1947 में हिंदुस्‍तान पाकिस्‍तान का बंटवारा हुआ था। तब किसी ने सोचा भी न होगा कि बीस साल में पाकिस्‍तान में जितने लोग गये थे। हम उससे ज्‍यादा फिर पैदा कर लेंगे।हमने एक पाकिस्‍तान फिर पैदा कर लिया है।1947 में जितनी संख्‍या पूरे हिंदुस्‍तान और पाकिस्‍तान को मिलाकर थी, आज अकेले हिन्‍दुस्‍तान की उससे ज्‍यादा है। यह संख्‍या इतने अनुपात से बढ़ती चली जा रही है।और फिर दुःख बढ़ रहा है। दरिद्रता बढ़ रही है, दीनता बढ़ रही है, बेकारी बढ़ रही है। तो हम परेशान होते है। उससे डरते है और हम कहते है कि बेकारी नहीं चाहिए, बीमारी नहीं चाहिए, हर आदमी को जीवन का सारा सुख सुविधाएं मिलनी चाहिए। और हम यह भी नहीं सोचते है कि जो हम कर रहे है उससे हर आदमी को जीवन की सारी सुविधाएं कभी भी नहीं मिल सकती। हमारे बेटे बेकार ही रहेंगे। भिखमंगी और गरीबी बढ़ेगी। लेकिन हमारे धर्म गुरु समझाते है कि यह ईश्‍वर का विरोध है, संतति नियमन की बात ईश्‍वर का विरोध है।हां धर्म गुरु जरूर चाह सकते है। क्‍योंकि मजे की बात यह है कि दुनिया में जितना दुःख बढ़ता है, धर्म गुरूओं की दुकानें उतनी ही ठीक से चलती है। दुनिया में सुख की दुकानें नहीं है। धर्म की दुकानें के दुःख पर निर्भर करती है।सुखी और आनंदित आदमी धर्म गुरु की तरफ नहीं जाता है। स्‍वस्‍थ और प्रसन्‍न आदमी धर्म गुरु की तरफ नहीं जाता है। दुःखी बीमार और परेशान व्‍यक्‍ति धर्म की तलाश करता है।दुःखी और परेशान आदमी आत्‍मा विश्‍वास खो देता है। वह किसी का सहारा चाहता है। किसी धर्म गुरु के चरण चाहता है। किसी का हाथ चाहता है। किसी का मार्ग दर्शन चाहता है।दुनिया में जब तक दुःख है, तभी तक धर्म गुरु टिक सकता है। धर्म तो टिकेगा सुखी हो जाने के बाद भी लेकिन धर्म गुरु के टिकने का कोई उपाय नहीं है। इसलिए धर्म गुरु चाहेगा कि दुःख खत्‍म न हो जायें, दुःख समाप्‍त न हो जाये। उनके अजीब-अजीब धंधे है।मैंने सुना एक रात एक होटल में बहुत देर तक कुछ मित्र आकर शराब पीते रहे, भोजन करते रहे। आधी रात जब वे विदा होने लगे तो मैनेजर ने अपनी पत्‍नी से कहा कि ऐसे भले प्‍यारे, दिल फेंक खर्च करने वाले लोग अगर रोज आयें तो हमारी जिंदगी में आनंद हो जायें। चलते वक्‍त मैनेजर ने उनसे कहा, ‘’आप जब कभी आया करें। बड़ी कृपा होगी। आप आये हम बड़े आनंदित हुए।‘’ जिस आदमी ने पैसे चुकाये थे, उसने कहा, भगवान से प्रार्थना करना कि हमारा धंधा ठीक चले हम रोज आते रहेंगे। मैनेजर ने पूछा,’’क्‍या धंधा करते है आप?उसने कहा कि मैं मरघट में लकड़ी बेचने का काम करता हूं। हमारा धंधा रोज चलता रहे तो हम बारबार आते रहेंगे। कभी-कभी होता है कि धंधा बिलकुल नहीं चलता। कोई गांव में मरता ही नहीं, लकड़ी बिलकुल बिकती नहीं। जिस दिन गांव में ज्‍यादा लोग मरते है, उस दिन लकड़ी ज्‍यादा बिकती है। जिस दिन ज्‍यादा धंधा होता है उस दिन आपके पास चले आते है।आपने सूना डाक्‍टर लोग भी कुछ ऐसा ही कहते है। जो मरीज ज्‍यादा होते है, तो कहते है सीजन अच्‍छा चल रहा है। आश्चर्य की बात है। अगर किन्‍हीं लोगों का धंधा लोगों के बीमार होने से चलता हो, तो फिर बीमारी मिटना बहुत मुश्‍किल है।अभी डॉक्टरों को भी हमने उलटा काम सौंपा हुआ है कि वह लोगों की बीमारी मिटाये। अत: उनकी भीतरी आकांशा यह है कि लोग ज्‍यादा बीमार हों, क्‍योंकि उनका व्‍यवसाय बीमारी पर खड़ा है।इसलिए रूस ने क्रांति के बाद जो काम किये, उनमें एक काम यह था कि उन्‍होंने डाक्‍टर के काम को नेश्‍नलाइज कर दिया। उन्‍होंने कहा कि डाक्‍टर का काम व्‍यक्‍तिगत निर्धारित करना खतरनाक है, क्‍योंकि वह उपर से बीमार को ठीक करना चाहेगा और भीतर आंकाक्षा करेगा की ‘’बीमार’’ बीमार ही बना रहे। कारण उसका धंधा तो किसी के बीमार रहने से ही चलता है। इसलिए उन्‍होंने डाक्‍टर का धंधा प्राइवेट प्रैक्टिस बिलकुल बंद कर दी। वहां डाक्‍टर को वेतन मिलता है। बल्‍कि उन्‍होंने एक नया प्रयोग भी किया है। हर डाक्‍टर को एक क्षेत्र दिया जाता है, उसमें यदि लोग बीमार होते है तो उससे एक्‍सप्‍लेनेशन मांगा जाता है। इस क्षेत्र में ज्‍यादा लोग बीमार कैसे हुए? वहां डाक्‍टर को यह चिंता करनी होती है की कोई बीमार ने पड़े।चीन में माओ ने आते ही वकील के धंधे को नेश्नलाइज कर दिया। क्‍योंकि वकील का धंधा खतरनाक है। क्‍योंकि वकील का धंधा कांन्‍ट्राडिक्‍टरी है। है तो वह इसलिए कि न्‍याय उपलब्‍ध करायें। और उसकी सारी चेष्‍टा यह रहती है कि उपद्रव हो, चोरी हो, हत्याएँ हो, क्‍योंकि उसका धंधा इसी पर निर्भर करता है।धर्म गुरु का धंधा भी बड़ा विरोधी है। वह चेष्‍टा तो यह करता है की लोग शांत हो, आनंदित हो, सुखी हो, लेकिन उसका धंधा इस पर निर्भर करता है कि लोग अशांत रहें, दुःखी रहें बेचैन और परेशान रहे। कारण अशांत लोग ही उसके पास यह जानने आते है कि हम शांत कैसे रहें। दुःखी लोग उसके पास आते है हमारा दुःख कैसे मिटे? दीन-दरिद्र उसके पास आते है कि हमारी दीनता का अंत कैसे हो?धर्म गुरु का धंधा लोगों के बढ़ते हुए दुःख पर निर्भर है।इसलिए जब भी दुनिया के धर्म गुरूओं ने सब बातें ईश्‍वर पर थोप दी है, और ईश्‍वर कभी गवाही देने आता नहीं है कि उसकी मर्जी क्‍या है? यह क्‍या चाहता है? उसकी क्‍या इच्‍छा है? इंग्‍लैण्‍ड और जर्मनी में अगर युद्ध हो तो इंग्‍लैण्‍ड का धर्म गुरु समझाता है कि ईश्‍वर की इच्‍छा है कि इंग्‍लैण्‍ड जीते? और जर्मनी का धर्म गुरु समझाता है कि ईश्‍वर की इच्‍छा है कि जर्मनी जीते। जर्मनी में उसी भगवान से प्रार्थना की जाती है कि अपने देश को जिताओ और इंग्‍लैण्‍ड में भी पादरी और पुरोहित प्रार्थना करता है कि है भगवान, अपने देश को जिताओ।ईश्‍वर की इच्छा पर हम अपनी इच्‍छा थोपते रहते है। ईश्‍वर बेचारा बिलकुल चुप है। कुछ पता नहीं चलता कि उसकी इच्‍छा क्‍या है। अच्‍छा हो कि हम ईश्‍वर पर अपनी इच्‍छा न थोपों। हम इस जीवन को सोचें, समझें ओर वैज्ञानिक रास्‍ता निकाले।यह भी ध्‍यान में रखने योग्‍य है कि जो समाज जितना समृद्ध होता है, वह उतने ही कम बच्‍चे पैदा करता है। लेकिन दुःखी दीन, दरिद्र लोग जीवन में किसी अन्‍या मनोरंजन और सुख की सुविधा न होने से सिर्फ सेक्‍स में ही सुख लेने लगते है। उनके पास और कोई उपाय नहीं रहता।एक अगर संगीत भी सुनता है, साहित्‍य भी पढ़ता है, चित्र भी देखता है, घूमने भी जाता है, पहाड़ की यात्रा भी करता है, उसकी शक्‍ति बहुत दिशाओं में बह जाती है। एक गरीब आदमी के पास शक्‍ति बहाने का और कोई उपाय नहीं रहता। उसके मनोरंजन का कोई और उपाय नहीं रहता। क्‍योंकि सब मनोरंजन खर्चीला है; सिर्फ सेक्‍स ही ऐसा मनोरंजन है, जो मुफ्त उपलब्‍ध है। इसलिए गरीब आदमी बच्‍चे इकट्ठे करता चला जाता है।गरीब आदमी इतने अधिक बच्‍चे इकट्ठे कर लेता है कि गरीबी बढ़ती चली जाती है। गरीब आदमी ज्‍यादा बच्‍चे पैदा करता है। गरीब के बच्‍चे और गरीब होते चले जाते है। वे और बच्‍चे पैदा करते जाते है और देश और गरीब होता चला जाता है। किसी ने किसी तरह गरीब आदमी की इस भ्रामक स्‍थिति को तोड़ना जरूरी है। इसे तोड़ना ही पड़ेगा,अन्‍यथा गरीबी का कोई पारावार न रहेगा। गरीबी इतनी बढ़ जायेगी की जीना असंभव हो जायेगा।इस देश में तो गरीबी बढ़ ही रही है, जीना करीब-करीब असंभव हो गया है। कोई मान ही नहीं सकता कि हम जी रहे है। अच्‍छा हो कि कहा जाये कि हम धीरे-धीरे मर रहे है।

Friday, 9 November 2012

एसे हैं मेरे राम एसे

सभी ललित  लला  हिन्दू धर्म मैं यह ही विशेस्ता हैं की माहाकाल कै मंदिर कै बाहर बैठ कर माहाकाल की बूराई कर सकता हैं इतनी आजादी ओर किसी धर्म  मै नहीं हैं भगवान राम पर राम जेठमलानी ने सवाल ऊठाये इस हिन्दू सनातन धर्म का कोई अपमान नहीं क्योंकि हिन्दू धर्म मान अपमान से परे हैं 1400 सालों हमले हो रहे हैं क्या हूआ कूछ ना समझ हैं जेठमलानी जैसे लोगो को  भगवान राम को समजने कै लिए राम जैसा बनाना पड़ेगा भगवान राम मानवता कै उदारक हैं भगवान राम कै बताये रास्ते पर आज का समाज सल रहा हैं कोई स्त्री अगर घर से बाहर रहे कर आएं तो उसका त्याग करना साहीए इस सीधानंत से कोई भी स्त्री अपनी मर्यादा ना लागे अगर भगवान राम माता सिता को वनवास नहीं देते तो हर ओरत भगवान राम की दूहाई दे कै किसी भी आदमी कै रह कर घर आती ओरतो को अपनी मर्यादा का भान कराने  कै लिए माता सिता को वन वास मिला मनूष्य जीवन कै आदर्श हैं भगवान राम भगवान राम पर प्रशन उठाने वाले नेतृत्व ओर मिड़ीया तूमारे कौनसे आदर्श हैं  एसे हैं मेरे राम भगवान हर्दय कमल कमल कूज तेज रामसा पूत्र  नहीं रामसा मित्र रामसा पति नही रामसा नहीं त्राता सारे जग कै प्रण हैं  राम रिषी मुनियो धायान  है राम गनधर्व का ज्ञान हैं  राम मर्यादा का भान हैं राम पतितो उथान  हैं राम धनूधारी धनवान हैं सम्पूर्ण हैं भगवान हैं राम एसे हैं मेरे राम


Monday, 5 November 2012

एक देश जो अपनी हि राष्ट भाषा से नजरें चूराता

पिछले दिनों आस्ट्रेलिया की प्रधान मंत्री ने हमारे आत्मसम्मान को ललकारते हुए कहा, ‘भारत अंग्रेज शासित देश है।’ ऐसा तब हुआ जब एक समिति ने आस्ट्रेलिया - भारत संबंधों को और बेहतर बनाने के लिए सभी राजनयिकों को हिन्दी सीखने का सुझाव दिया। इस सुझाव को वहाँ की प्रधानमंत्री ने अस्वीकार करते हुए उक्त टिप्पणी की। सच ही तो है, जो राष्ट्र स्वयं अपनी राष्ट्रभाषा से नजरें चुराता हैं उसे अपने स्वाभिमान को आहत कर देने वाली ऐसी टिप्पणियों के लिए तैयार रहना चाहिए। यह दुनिया का सबसे बड़ा आश्चर्य है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के इतने वर्ष बाद भी हम विदेशी भाषा अंग्रेजी की दासता से मुक्त नहीं हो पा रहे हैं। राजधानी दिल्ली का अधिकतर शासकीय कार्य विदेशी भाषा में होता है।

हर व्यक्ति के लिए आवश्यक ड्राईविंग लाईसंेस पर एक भी शब्द हिन्दी का नहीं। इस सप्ताह हिन्दी, पंजाबी, उर्दू अकादमी तथा साहित्य कला परिषद के संयुक्त तत्वावधान में हो रहे सांस्कृतिक कार्यक्रम के निमंत्रण पत्र में हिन्दी, पंजाबी अथवा उर्दू का एक भी शब्द नहीं। सब अंग्रेजी में होना क्या साबित करता है? क्या स्व-भाषा या राष्ट्रभाषा हिन्दी में कुछ कमी है? सत्य यह है कि हम हीनता-ग्रन्थि के शिकार होकर अनेक भ्रम व पूर्वाग्रहण पाले हुए हैं। आज अंग्रेजी माध्यम के स्कूल लोकप्रिय हो रहे हैं। हमारे बच्चों को हिन्दी में गिनती भी नहीं आती। क्या यह हमारे लिए शर्मनाक बात नहीं है? दरअसल हम भ्रम का शिकार है कि अंग्रेजी अकेली अन्तर्राष्ट्रीय भाषा है जो पूरी दुनिया में समझी व बोली जाती है। सच्चाई यह है कि संयुक्त राष्ट्रसंघ में छह भाषायें चलती हैं। फ्रेंच, अंग्रेजी, रूसी, चीनी, और अरबी।

भारत की कुल जनसंख्या में आधे से अधिक लोग हिन्दी बोलते समझते व लिखते हैं। अन्य विदेशी भाषियों से हिन्दी कई गुना अधिक बड़ी है फिर भी संयुक्त राष्ट्रसंघ ने हिन्दी को स्वीकृति नहीं दी है तो इसका कारण हमारे प्रयासों का खोखलापन है, हिन्दी का नहीं। कितने लोग मानते हैं कि विश्व की अन्तर्राष्ट्रीय डाक भाषा अंग्रेजी नहीं, फ्रेंच है। अंग्रेजी तो अपने देश इंग्लैंड में भी बड़ी मुश्किल से राष्ट्रभाषा बन सकी थी। फ्रांस में ऐसे 4000 शब्दों की सूची बनाई गई है जो उनकी भाषा में जबर्दस्ती घुस गए थे। एक विधेयक पारित कर इन शब्दों के फ्रेंच में इस्तेमाल रोकने का आदेश दिया गया।

मेरा स्वयं का अनुभव है कि फ्रांसवासियों में स्व-भाषा के प्रति जबरदस्त आदर है। वे अपनी भाषा को अंग्रेंजी से बेहतर मानते हैं। नीदरलैंड में अंग्रेजी हटाने के लिए एक आंदोलन हुआ क्योंकि उनके अनुसार डच भाषा व संस्कृति को इससे खतरा है। चीन, जापान, कोरिया और वियतनाम में सरकारी फरमान या आदेश अंग्रेजी में आने पर जनता तीव्र विरोध प्रकट करती है। जापानी भाषा दुनिया की सबसे कलिष्ट है। उसकी लिपि में 5000 से अधिक चिन्ह हैं। लेकिन उसके बावजूद वे हर कार्य अपनी भाषा में ही करना पसंद करते हैं।

अंग्रेजी के बिना ही जापान ने जबरदस्त उन्नति की है। उसके इलैक्ट्रोनिक सामान व उपकरण बनाने में विश्व में सर्वोच्च स्थान प्राप्त देश है जिसके माल की खपत हर जगह है। यही दशा चीन की भी है, जो आज सारी दुनिया के बाजारों पर कब्जा जमा रहा है। अनेक देशों जिनमें लीबिया, ईराक व बांग्लादेश शामिल है ने एक झटके में अंग्रेजी को निकाल बाहर कर दिया।

कर्नल गद्दाफी ने तो सेना को छह मास में अंग्रेजी हटाने का आदेश दे दिया। ईराक के पिछले शासक ने तो यहाँ तक कह दिया था कि जिसे अंग्रेजी पढ़नी हो वे ईराक छोड़ दें। बांग्लादेश ने ईसाई मिशनरी के संदर्भ में कहा कि इनकी अंग्रेजी से हमारी बंगाली भाषा को खतरा है। माओत्से तुंग ने सत्ता पर काबिज होते ही पूरे चीन में एक ही चीनी भाषा लागू कर दी, जबकि पहले वहां भी 6-7 क्षेत्रीय भाषाएं थी। एक चीनी भाषा होने के कारण भाषायी एकता होने से सभी चीनी स्वयं को एक सूत्र में जुड़े अनुभव करते हैं। स्पष्ट है कि अंग्रेजी कोई सर्वसम्मत अंतर्राष्ट्रीय भाषा नहीं है, जैसा कि हम समझते हैं। यह भी सभी को ज्ञात है कि अंग्रेजी वैज्ञानिक भाषा भी नहीं है। स्वयं अंग्रेज साहित्यकार बर्नाड शा इसे अराजक भाषा घोषित कर चुके हैं क्योंकि हर ध्वनि के लिए कोई तयशुदा शब्द नहीं है। इसके विपरित हिन्दी पूर्णतः वैज्ञानिक भाषा है। विदेशी भाषा की गुलामी अनावश्यक है। जो लोग यह तर्क देते है कि बेहतर क्षमता के लिए अंग्रेजी आवश्यक है उन्हें कौन समझाये कि तमिलनाडु में तीन मुख्यमंत्री सर्वश्री कामराज, एम.जी.रामचंद्रन व करूणनिधि को अंग्रेंजी का ज्ञान नहीं था तो भी उनका काल किसी भी तरह से कमतर नहीं कहा जा सकता।

कुछ लोग अंग्रेंजी को बनाये रखने के लिए क्षेत्रीय भाषाओं को हिन्दी से लड़ाने की कोशिश कर रहे हैं जबकि तथ्य यह है कि दोनों एक दूसरे की पूरक है। यदि क्षेत्रीय भाषाओं को खतरा है तो विदेशी भाषा से है। राष्ट्रभाषा सम्पूर्ण राष्ट्र के हृदयों को जोड़ती है। सम्पर्क भाषा बनकर आपसी संबंध सुदृढ़ बनाती है। हिंदी पूरे भारत की भाषा है। वह साहित्य की जननी, सभ्यता की पोषिका एवं संस्कृति की प्रेरणा है। श्री गोपालसिंह नेपाली ने एक जगह कहा है - हिंदी में गुजराती का संजीवन है, मराठी का चुहल (विनोद) है, कन्नड का माधुर्य है एवं है संस्कृत का अजस्र स्रोत। प्राकृत ने इसका श्रृंगार किया है और उर्दू ने इसके हाथों में मेंहदी लगाई है। यह आर्यों के स्वरों में गाती है और अनार्यों के ताल पर नाचती है। हिंदी राष्ट्रभाषा है। वस्तुतः हिंदी एक परंपरा का नाम है, एक सततवाहिनी सरिता का नाम है, जिसमें असंख्य नद-नालों की अंजलियां समर्पित होती रहती हैं, जिसमें पूरे भारत के प्राण तरंगित होते रहते हैं।’ हिन्दी को सबसे ज्यादा प्रोत्साहन अहिन्दीभाषियों ने दिया। 1918 में बंगाली लेखक नलिनी मोहन सान्याल ने लंदन विश्वविद्यालय में हिन्दी में शोध् ग्रंथ प्रस्तुत किया। ब्रह्म समाज के नेता बंगला-भाषी केशवचंद्र सेन से लेकर गुजराती भाषा-भाषी स्वामी दयानंद सरस्वती ने जनता के बीच जाने के लिए जन-भाषा हिन्दी सीखने का आग्रह किया। गुजराती भाषी महात्मा गांधी, मराठी-भाषी काका कालेलकर ने सारे भारत में घूम-घूमकर हिन्दी का प्रचार-प्रसार किया।

नेताजी सुभाषचंद्र बोस की आजाद हिन्द फौज की भाषा हिन्दी ही थी। महर्षि अरविंद घोष हिन्दी-प्रचार को स्वाधीनता-संग्राम का एक अंग मानते थे। न्यायमूर्ति श्री शारदाचरण मित्र कहा करते थे- यद्यपि मैं बंगाली हूं तथापि इस वृद्धावस्था में मेरे लिए वह गौरव का दिन होगा जिस दिन मैं सारे भारतवासियों के साथ हिन्दी में वार्तालाप करूंगा।’ बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय और ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने भी हिन्दी का समर्थन किया था। आज भी तमिलनाडू निवासी डॉ. बालशौरि रेड्डी से पंजाब के डॉ. हरमहेन्द्र सिह बेदी तक, जम्मू-कश्मीर के डॉ. चमनलाल सप्रू से शिलांग के अकेला भाई तक साहित्य के माध्यम से हिन्दी सेवा में सक्रिय है। वर्धा में स्थापित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय जिसके वर्तमान कुलपति डा.गोपीनाथन मलयालम भाषी है, इस दिशा में बहुत महत्वपूर्ण कार्य कर रहा है। दुनिया के पचास से अधिक देशों हिन्दी में पठन-पाठन की सुविधा है। अनेक देश हिंदी कार्यक्रम प्रसारित कर रहे हैं, जिनमें बीबीसी, यूएई क़े हम एफ-एम, जर्मनी के डॉयचे वेले, जापान के एनएचके वर्ल्ड और चीन के चाइना रेडियो इंटरनेशनल की हिंदी सेवा विशेष रूप से उल्लेखनीय है। हिन्दी की वर्तमान दशा के लिए हमारी शिक्षा पद्धति और शासन व्यवस्था-दोनों जिम्मेदार हैं।

अगर देश पर हावी अंग्रेजियत को हटाना है तो शिक्षा पद्धति में आमूलचूल परिवर्तन लाना होगा। पहली से लेकर 10 कक्षा तक की शिक्षा से भारतीय भाषाओं का प्रयोग अनिवार्य करना होगा। विज्ञान, भूगोल आदि की पढ़ाई मातृभाषा में ही कराने का प्रावधान करना होगा। उसके बाद भी अंग्रेजी को एक अतिरिक्त विषय के रूप में पढ़ाया जाना चाहिए। जब एक व्यक्ति अपनी भाषा में प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करेगा, तो उस भाषा के प्रति उसका मोह और सम्मान आजीवन बना रहेगा। हिन्दी की मौजूदा स्थिति के लिए प्रशासन भी कम दोषी नहीं है। संसद से लेकर निम्न पदों तक सभी कार्य अंग्रेजी भाषा में किये जाते हैं। क्या संसद में हिन्दी भाषा में काम-काज नहीं यिका जा सकता? तर्क दिया जाता है कि सभी लोग हिन्दी नहीं जानते। क्या कभी उनसे पूछा गया है कि सभी लोग अंग्रेजी भी नहीं जानते।

अंग्रेजी जानने वालों का प्रतिशत हिन्दी भाषा जानने वालों से बेहद कम है, इस तथ्य को जानने के बाद भी मातृभाषा में काम क्यों नहीं किया जाता? अगर समस्या तेलुगू, बंगाली या अन्य क्षेत्रीय भाषाओं की है तो उनके लिए अनुवादक नियुक्त किये जा सकते हैं। सूचना प्रौद्योगिकी के विकास का इस्तेमाल बखूबी कर सकते हैं। हम भारतीयों को अपनी उस मानसिकता में बदलाव लाना होगा कि हिन्दी जानने वाले व्यक्ति का बौद्धिक स्तर अंग्रेजी भाषा जानने वाले व्यक्ति के बराबर नहीं हो सकता, वह शीर्ष पर नहीं पहुंच सकता। इस तरह की मानसिकता में बदलाव लाने की जिम्मेवारी सिर्फ सरकार की नहीं है। हिन्दी के प्रचार-प्रसार और सम्मान के लिए हम सभी को स्वयं आगे आना होगा। साल में एक बार ‘हिन्दी दिवस मनाने जैसे कर्मकाण्ड से ही हिन्दी को वह सम्मान नहीं मिल सकता, जिसकी वह हकदार है। आईए स्वयं से ही शुरूआत करें।by ibtl web copy www.ibtl.com