Tuesday, 1 April 2014

राजनीति और धर्म ः शरीर और आत्मा तो धर्मनिरपेक्ष कैसे

मेरे प्रिय आत्मन 
          धर्म जीवन को जीने की कला है जीवन को जीने का विज्ञान हम जीवन को उसके पुरे अर्थों मैं कैसे जिसे , धर्म उसकी खोजबीन है धर्म यदि जीवन-कला की आत्मा है तो राजनीति जीवन कला-कला का शरीर है ।  धर्म अगर प्रकाश है जीवन का तो राजनीति प्रथ्वी है । न आत्मा अकेली हो सकती है  न शरीर अकेला हो सकता है शरीर न हो तो आत्मा अदृश्य हो जाती है और खो जाती है और आत्मा न हो तो शरीर सड़ जाता है दुर्गन्ध देने लगता है धर्म कै बीना राजनीती सड़ा हुआ शरीर हो जाती है लेकिन स्मरण रहे राजनीति से धर्म विहीन धर्म भी अदृश्य हो जाता है और विलीन हो जाता है इसलिए धर्म और राजनीति पर कुछ कहने के पहले उन दोनों के बीच के आंतरिक संबंध को समझ लेना ज़रूरी है । 
जीवन मैं जो सक्रिय सत्ता है जीवन को बदलने का जो सक्रिय आंदोलन है जीवन को चलाने और निर्मित करने की जो व्यवस्था है उस सबका नाम राजनीति है राजनीति कै भीतरी अर्थ भी है शिक्षा भी है राजनीति कै भीतर हमारे पारिवारिक संबंध भी है । 
राजनीति कै भीतर हमारे हमारे सारे अंतसंबध है लेकिन भारत का दुर्भाग्य ही समझा जाना चाहिए कि हज़ारों वर्षों से राजनीति और धर्म बीच कोई संबंध नही रहा भारत मैं राजनीति और धर्म जैसे विरोधी रहे हो एक दुसरे की तरफ़ पीठ खड़े किये है 
और यह आज की ही बात नहीं है हज़ारों वर्षों से ऐसा हुआ है और उसका दुष्परिणाम भी भोगा है हमने भोगा है एक हज़ार वर्ष की ग़ुलामी उसका दुष्परिणाम है । हिन्दूस्थान ग़ुलाम हुआ क्योंकि हिन्दूस्थान के धार्मिक लोगों के मन मे ऐसा नहीं लगा कि उन्हें कुछ करना है धर्म का राजनीति से कोई संबंध ही नहीं था धार्मिक आदमी को लगता था कोई भी हो नृप हमें क्या हानि कोई भी राजा हो कोई भी सरकार हमें क्या प्रयोजन है कोई भी हो सत्ता मे हमें किया विचार की बात है धर्म को हमने हज़ारों वर्षों से राजनीति निरपेक्ष बना दिया है इसका बदला हिन्दूस्थान की राजनीति ने अभी अभी लिया उसने राजनीति को धर्म निरपेक्ष बना दिया हज़ारों वर्षों तक हिन्दूस्थान का धर्म राजनीति निरपेक्ष था उसका एक ही परिणाम होने को था । और अंतिम परिणाम यह हुआ कि हिन्दूस्थान की राजनीति अब धर्म निरपेक्ष है हज़ारों वर्षों तक धार्मिक आदमी कहता रहा कि राजनिति से हमें कुछ लेना देना नहीं है और राजनीति अभी बीस साल पहले बदला दिया और उसने कहा धर्म से हमें कुछ लेना देना नहीं लेकिन कोई राजनीति धर्म निरपेक्ष कैसे हो सकती है राजनीति कै धर्म निरपेक्ष होने का क्या अर्थ हो सकता है एक ही अर्थ हो सकता है जीवन मैं जो महत्वपूर्ण है जो भी श्रेष्ठ है राजनीति का उससे कोई प्रयोजन नही मनुष्य के ऊँचे से ऊँचे उठने की जो भी संभावनाये है राजनीति उसके संबंध मैं कोई भी सक्रिय भाग अदा नहीं करना चाहती धर्म निरपेक्ष होने का अर्थ होता है --सत्य से निरपेक्ष होना प्रेम से निरपेक्ष होना जीवन कै गहनतम ज्ञान से निरपेक्ष होना कोई भी राजनीति अगर धर्म निरपेक्ष होगी तो वही मनुष्य के शरीर मैं गहरा ज्यदा प्रवेश नहीं कर सकती और जो समाज या राष्ट केवल शरीर कै आस पास जीने लगता है उस समाज कै जीवन मे उसी तरह दुर्गन्ध पैदा हो जायेगी जैसे मरी हुई लाश मैं हो जाती है आज़ादी कै बाद भारत का सारा जीवन दुर्गन्ध से करूपता से ग्लानि से दुख और पीड़ा से भर गया शायद मनुष्य - जाती के इतिहास मैं कोई भी देश स्वतंत्र होकर इस भाँति कभी पतित नहीं हुआ है यह दुर्घटना कैसे घट सकी ? यह दुर्घटना घट सकी इसलिए कि जीवन को ऊँचे उठानेवाले जो भी सिद्धांत है उन सब सिद्धांतों का इकट्ठा नाम धर्म है और हमारे देश की राजनीति धर्म के प्रति निरपेक्ष है धर्म का उससे कोई प्रयोजन नहीं लेकिन राजनीतिज्ञों को यह दोष देना ग़लत होगा अगर हम पुराना इतिहास उठाकर देखें तो पता चलेगा कि हिन्दूस्थान के धार्मिक लोगों ने भी राजनीति कै साथ इतना ही ग़लत व्यवहार किया है वे आज तक कह रहे थे कि धर्म राजनीति से निरपेक्ष है राज्य ग़ुलाम हो जाए यहाँ स्वतंत्र देश दुष्टो के हाथों मैं जाए यहाँ अच्छे लोगों के हाथ में जाये कि कौन हकूमत करें कि किस भाँति हकूमत करें इससे धार्मिक आदमी को कोई प्रयोजन न था एक हज़ार वर्षों तक मुल्क ग़ुलाम था और हिन्दूस्थान कै साधु- संन्यासियो ने ज़रा भी इस ग़ुलामी को उखाड़ फेंकने का कोई प्रयास किया एक हज़ार साल की ग़ुलामी के इतिहास मैं हिन्दूस्थान कै संत ने एक बार भी यह आवाज़ नही दी कि इस मुल्क को आज़ाद होना है क्योंकी साधु संत कहते है हम राजनीति से क्या प्रयोजन । 
आश्चर्य की बात यह की साधु संतों को ग़ुलामी बुरी नहीं मालुम पड़ी आश्चर्य की बात है कि मुल्क की छाती पर दुश्मन सवार रहा मुल्क का खिन्न दुश्मन पीता रहा और मुल्क के साधु- संन्यासी स्वर्ग और परलोक की चर्चाये करते रहे मंदीरो मैं बैठ कर निर्मित महत्वपूर्ण है कि उतादान इस पर वे विचार करते रहे और मुल्क ग़ुलाम और पतित होता चला गया हिन्दूस्थान ग़ुलाम रहा आया क्योंकि हिन्दूस्थान के धार्मिक लोगों के मन में ऐसा नहीं लगा कि उन्हें कुछ करना है धर्म का राजनीति से कोई संबंध नहीं था एक हज़ार वर्षों तक हिन्दूस्थान 
के साधुओं और संन्यासियो और धार्मिक लोगों ने हिन्दूस्थान के भाग्य को बदलने को बदलने कै लिए कुछ नहीं किया स्वाभाविक था कि जब धर्म इतना निरपेक्ष रहा हो राजनीति तो राजनीति मुल्क में सत्ता आई तो उसने कहा धर्म से हमको कुछ लेना देना नहीं है यह बदला था लेकिन ग़लत चीज़ का बदला भी कभी यह नहीं होता है बदला भी ग़लत होता है ग़लत चीज़ का जो बदला लेते है वे भी ग़लत होते है पुनः अब विचारणीय हो गया है हम अपनी मनःस्थिति को पुनः तौल ले विचार करले कि क्या राजनीति और धर्म को इतने दुर रखना हितकार है क्या यह उचित है क्या यह योग्य है राजनीतिज्ञों को यह सहूलियत की बात थी कि धर्म राजनीति से दुर रहे क्योंकि जैसे ही राजनीतिज्ञ कै सामने धर्म प्रतिक खड़े हो जाते है राजनीतिज्ञ को नीचे गिरने की आसानी कम हो जाती है धर्म एक चुनौती है ऊपर उठाने के लिए धर्म एक पुकार है है कि निंरतर ऊपर उठते रहो धर्म एक आह्वान है कि मनुष्य को ऊँचे से ऊँचे शिखरों पर चढ़ना है राजनीतिज्ञ नहीं चाहता कि धर्म से राजनीति का कोई संबंध हो क्योंकि जैसे ही राजनीति का धर्म से कोई संबंध होता है राजनीतिज्ञ को अपने को बदलना पड़ेगा राजनीतिज्ञ नहीं चाहता कि धर्म का कोई राजनीति से हो क्योंकि जब धर्म से कोई संबंध हो तो उसे षड्यंत्र करने उसे निम्नतम व्यवस्था देने उसे चोरी और बेईमानी और असत्य का उपयोग करने की पुर्णतम सुविधा उपलब्ध हो जाती है उसके पीछे कोई भी आह्वान नहीं रह जाता है कि वही उप्र उठे राजनीति धर्म से अलग होकर सिर्फ़ कूटनीति रह जाती है राजनीति नही रह जाती वह पालिटिक्स नहीं होती सिर्फ़ डिप्लोंेसी होती है और जूठ और सच मैं कोई फ़र्क़ नहीं रह जाता 
                   भारत कै जलते प्रश्न ओशो 
                     प्रवचन 18 से संकलन